सोमवार, 24 नवंबर 2025

चुप्पियों का मौसम



रोज़-रोज़ बात करने वाले
अब चुप रहते हैं,
जैसे शब्दों में कोई
सूखा हुआ समुंदर बहते हैं।

कभी आँखों के इशारों में
कितने मेले सजते थे,
अब वही नज़रें रास्ते बदल
दूर किनारों पर बसते हैं।

पहले तो
साँसों तक में उनका नाम घुला था,
अब जैसे हर सवाल का
लापता-सा जवाब खुला था।

तुम कहो…
क्या रिश्ते भी थक जाते हैं?
या यादें अपनी दौड़ में
कहीं गिरकर रह जाती हैं?

हमने तो सुना था
मोहब्बत बोलती है,
फिर ये सन्नाटा
किसकी जीत है, किसकी हार?
कौन बताता है?

हर सुबह,
चाय में शक्कर कोई कम नहीं होती,
फिर दिल की मिठास
इस कदर कड़वी क्यों लगती?

कभी जो
दिल के पन्नों पर हस्ताक्षर हुआ करते थे,
अब वो नाम भी
अनजाने हाथों से मिटते हैं।

रोज़ की हँसी-ठिठोली,
बिन वजह की शिकायतें,
अब बदले में
बस खामोशी की कसी हुई कफन मिलती है।

क्या इश्क़
इतना कमजोर हो गया?
कि दो अल्फ़ाज़ न बोले जाएँ
तो टूटकर बिखर जाए?

या फिर
इंसान ही बदल गए हैं?
बातों की भीड़ में रहकर
बोलना ही भूल गए हैं…

रोज़-रोज़ बात करने वाले
अब चुप रहते हैं,
पर दिल के तहखानों में
उलझे जज़्बात कहते हैं—

“खामोशी भी एक भाषा है,
जिसका अर्थ वही समझ पाता है
जिसके दिल में अभी भी
कोई इंतज़ार ज़िंदा हो।”

हो सकता है—
चुप रहने वाले
आज भी हमारी बातों को तरसते हों,
बस इगो की धूल ने
उनके होंठों को जकड़ा हो।

चलो…
हम ही बोल दें फिर से,
नफरत को न बहने दें,
ये रिश्ते शब्दों की बारिश माँगते हैं,
चुप्पियों से नहीं…
मोहब्बत हंसकर बचती है।

वरना एक दिन
ये सन्नाटा ही लिख देगा—
“कभी दो लोग रोज़-रोज़ बात करते थे
अब…
एक-दूसरे की याद में
खामोश मरते हैं।”


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