कुछ मनबढ़ लोग कहते हैं—
“तुम्हें कोई काम नहीं है क्या?”
हाँ, सच ही तो है—
मैं काम नहीं करती,
मैं तो ज्वलंत ख्वाब सजाती हूँ।
मैं रंगों से बातें करती हूँ,
धूप को ओढ़ लेती हूँ,
और हवाओं में
अपनी हँसी टाँक देती हूँ।
जहाँ लोग थककर रुक जाते हैं,
मैं वहीं
एक नया सवेरा लिख देती हूँ—
चमकता हुआ, मुस्कुराता हुआ।
मेरे शब्दों में
दीपों की उजास है,
हर पंक्ति में
एक खिलता हुआ आकाश है।
और सुनो—
जिसे मेरे ख्वाबों से
ज़रा भी असहजता हो,
जिसे मेरी कविताओं की उड़ान
रास न आए,
जिसे मेरी लेखनी की चमक
चुभती हो—
वह निश्चिंत रहे,
मेरी दुनिया से दूर ही रहे।
क्योंकि मैं
अपने स्वप्नों की रोशनी में
खुद को जीती हूँ,
और हर क्षण को
एक उत्सव बना देती हूँ।