रविवार, 5 अप्रैल 2026

कुछ मनबढ़ लोग

कुछ मनबढ़ लोग कहते हैं—
“तुम्हें कोई काम नहीं है क्या?”
हाँ, सच ही तो है—
मैं काम नहीं करती,
मैं तो ज्वलंत ख्वाब सजाती हूँ।
मैं रंगों से बातें करती हूँ,
धूप को ओढ़ लेती हूँ,
और हवाओं में
अपनी हँसी टाँक देती हूँ।
जहाँ लोग थककर रुक जाते हैं,
मैं वहीं
एक नया सवेरा लिख देती हूँ—
चमकता हुआ, मुस्कुराता हुआ।
मेरे शब्दों में
दीपों की उजास है,
हर पंक्ति में
एक खिलता हुआ आकाश है।
और सुनो—
जिसे मेरे ख्वाबों से
ज़रा भी असहजता हो,
जिसे मेरी कविताओं की उड़ान
रास न आए,
जिसे मेरी लेखनी की चमक
चुभती हो—
वह निश्चिंत रहे,
मेरी दुनिया से दूर ही रहे।
क्योंकि मैं
अपने स्वप्नों की रोशनी में
खुद को जीती हूँ,
और हर क्षण को
एक उत्सव बना देती हूँ।

शनिवार, 4 अप्रैल 2026

दोहरे चेहरे

क्यों नहीं हो पाते हम
वैसे ही—
जैसे होने का स्वप्न
अपनी ही आँखों में सँजोते हैं?
क्यों ओढ़ लेते हैं हम
मुस्कानों के उजले आवरण,
जब भीतर का आकाश
अब भी संध्या की उदासी से भीगा होता है?
हम चलते तो हैं प्रकाश की ओर,
पर छायाओं को
आँचल में छुपाए रखते हैं—
मानो सत्य का स्पर्श
हमें स्वयं से ही अपरिचित कर देगा।
क्या यह भय है?
या वह आदत,
जिसने हमें सिखा दिया है
कि दुनिया के सामने
एक और चेहरा पहन लेना ही सहज है?
हम अपने ही भीतर
कितने अजनबी हो गए हैं—
जहाँ भावनाएँ भी
स्वर लेने से पहले
अनुमति माँगती हैं।
दिखावे के ये आवरण
कभी-कभी इतने सघन हो जाते हैं
कि असली “मैं”
उनकी तहों में कहीं खो जाता है—
जैसे कुहरे में
भोर का पहला प्रकाश भटक जाए।
कितना सरल होता—
यदि हम वही रहते
जो हम हैं,
यदि शब्दों में वही सच्चाई होती
जो मौन में छिपी है।
पर शायद
यह संसार अभी इतना निश्चल नहीं
कि नग्न सत्य को स्वीकार सके—
इसलिए हम
अपने ही अस्तित्व को
संकोच की चादर में लपेटे रहते हैं।
और यूँ ही—
जीवन की संध्या तक
हम खोजते रह जाते हैं
वह चेहरा,
जो कभी हमारा अपना था…
पर अब
दिखावे की धूल में
धीरे-धीरे धुँधला गया है।

जय श्री राम 🙏