पति हो…
परमेश्वर नहीं।
तुम संग हो—पर
मेरी साँसों पर अधिकार नहीं।
तुम्हें मैंने
सम्मान के आसन पर बैठाया था,
पर मैंने अपने भीतर
एक देवी को भी जगाया था।
वो देवी, जो डरती नहीं—
जो झुकती नहीं—
जिसे अपनी पहचान खोकर
किसी रिश्ते में घुलना
कभी स्वीकार नहीं।
मैंने प्रेम किया
पर भक्ति नहीं,
मैंने सम्मान दिया
पर अंधी श्रद्धा नहीं।
क्योंकि पति हो…
परमेश्वर नहीं।
तुम्हारे शब्द अमृत नहीं
कि पीते ही सत्य बन जाएँ,
तुम्हारे निर्णय आदेश नहीं
कि मेरी इच्छा मिट जाए।
मैंने साथ माँगा था—
सिर झुकाना नहीं,
मैंने कंधा माँगा था—
पाँव पड़ना नहीं।
मैं तुम्हारी
मनमानी की सीढ़ियाँ नहीं,
मैं ताज महल नहीं
जहाँ हर दर्द दफ़्न हो जाए।
मैं धड़कन हूँ,
सांसों का धागा हूँ,
जिसे बाँधकर रखने का हक़
किसी परमेश्वर को भी नहीं—
तुम तो फिर भी इंसान हो।
पति हो…
परमेश्वर नहीं।
रिश्ता तब सुंदर होता है
जब दोनों बराबर खड़े हों,
एक श्रद्धा में झुक जाए
और दूसरा अधिकार में चढ़ जाए—
ऐसा रिश्ता टूटकर गिरता है,
घुटकर जीता है।
मैंने सुना है,
विवाह बंधन है—
पर बंधन का मतलब
कैद नहीं होता।
बंधन तो वह धागा है
जो दो आत्माओं को
खुले आकाश में उड़ने देता है,
एक-दूसरे के पंख काटकर
अपनी सत्ता नहीं बढ़ाता।
मैं तुम्हारी साथी हूँ—
संपत्ति नहीं,
जीवन-सहचरी हूँ—
प्रजा नहीं।
तुम्हारे साथ चलना चाहती हूँ
पर तुम्हारे पीछे नहीं छिपना,
तुम्हारे हाथ में हाथ देना चाहती हूँ
पर अपनी आवाज़
तुम्हारी जुबान में नहीं गँवाना।
तुम्हें प्रेम करती हूँ—
पर पूजा नहीं।
तुम्हें चाहती हूँ—
पर खुद को खोकर नहीं।
क्योंकि—
पति होना
ज़िम्मेदारी है,
परमेश्वर होना
घमंड।
और मैं
घमंड का नहीं—
सहयोग का संसार चाहती हूँ।
जहाँ तुम कह सको—
“तुम मेरी हो”
पर मैं भी कह सकूँ—
“और मैं अपनी भी हूँ।”
जहाँ प्रेम बराबरी पर खड़ा हो,
सम्मान दोनों ओर झुका हो,
और संबंध
इंसानों की तरह साँस ले—
परमेश्वर की तरह आदेश न दे।
इसलिए…
पति हो—
परमेश्वर नहीं।
और मैं वही स्त्री हूँ
जो प्रेम में जीवन देती है,
पर अधिकार में
खुद को मरने नहीं देती।
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