जो अपनी सोच की जंजीरों में,
दूसरों की आज़ादी को बाँधने की कोशिश करते हैं।
मैं डरती नहीं उनकी बातें सुनकर,
न ही उनके तानों, न उनके कटु शब्दों से,
मैं डरती हूँ केवल उन लोगों से,
जो मेरी ताकत को देखकर भी अंधे बन बैठते हैं।
मैं स्त्री हूँ—
नाम मेरा छोटा, आत्मा मेरी विशाल,
मेरे शब्द कवच हैं, मेरे कदम तलवार।
हर विचार में आग, हर सांस में साहस,
और हर धड़कन में अपनी आज़ादी का गीत।
वे कहते हैं—“तुम नहीं कर सकती,”
मैं मुस्कुराती हूँ और करती हूँ।
वे कहते हैं—“तुम कमज़ोर हो,”
मैं उठती हूँ और साबित करती हूँ।
क्योंकि मेरी हिम्मत
उनकी हदों से परे है,
मेरी सोच उनके तुच्छ मन से ऊँची है।
मैं नहीं डरती उनकी नज़रों से,
जो बस बातें बनाकर दूसरों को परखते हैं।
मैं डरती हूँ केवल
कि वे मेरी आग को न समझ पाएं,
कि वे मेरी आत्मा की गहराई को न जान पाएं,
और मैं हर बार, हर बार
और प्रबल होकर उठूँ।
मैं स्त्री हूँ—
अनंत, अडिग, अविचल,
जैसे पर्वत की चोटियाँ
और समंदर की लहरें।
मेरी आत्मा का सूरज
कभी ढलता नहीं,
और कोई अँधेरा
मुझे जकड़ नहीं सकता।
मेरे विचार स्वतंत्र,
मेरी इच्छाएँ असीम,
मेरी आवाज़ गूंजती है
हर दिल तक, हर धरती तक।
जो मुझे रोकना चाहे,
जो मेरी छवि को बदनाम करे,
वे नहीं जानते कि
मैं अपनी पहचान खुद बनाती हूँ,
अपने जीवन की कहानी खुद लिखती हूँ,
और अपनी शक्ति की मिसाल बनकर
हर मुश्किल को चुनौती देती हूँ।
क्योंकि मैं स्त्री हूँ—
जो डर को चुनौती देती है,
जो अपमान को सम्मान में बदल देती है,
और जो अपने अस्तित्व की चमक से
सारी दुनिया को रोशन कर देती है।
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