मंगलवार, 25 नवंबर 2025

मै अनादि की पुत्री हु

हिंदू शेरनी नहीं, अनादि की पुत्री हूं मैं,
धर्म की नहीं — अस्तित्व की रखवालिन हूं मैं।
मेरा जन्म युद्ध से नहीं,
पर सत्य की दीक्षा से हुआ है,
मैं तलवार नहीं,
अंतर की अग्नि से लड़ी हूं मैं।

मैं हुंकार इसलिए नहीं भरती
कि कोई डर जाए,
मैं गरज इसलिए उठाती हूं
कि सोई हुई चेतना जाग जाए।

मेरी पहचान किसी झंडे के रंग से नहीं,
मेरी आत्मा ही मेरा ध्वज है।
जो भी मेरी अस्मिता को छुए,
वह समझ ले —
मैं फूल की तरह नरम सही,
पर जड़ों में पर्वत लिए खड़ी हूं।

मैं लड़ूंगी नहीं किसी से
बस इसलिए कि युद्ध हो,
मैं लड़ूंगी इसलिए
कि मेरे भीतर की स्त्री देवत्व का अपमान न हो।

मुझे कोई मुकुट नहीं चाहिए,
ना भीड़ की तालियाँ,
मेरा असली राज्य वो क्षण है
जब मेरी आत्मा खुद की रानी बन जाए।

मैं हिंदू शेरनी नहीं,
मैं समय की बेटी हूं —
आदिकाल से लेकर अनंत तक
अपने अस्तित्व की ज्वाला
युगों के मध्य जलाए रखूंगी।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें