पर सच्चाई यह है —
मर्यादा वह आख़िरी क़िला है
जहाँ आत्मा बिना हथियारों के भी अजेय खड़ी रहती है।
स्त्री की मर्यादा उसके वस्त्र, आभूषण या शब्द नहीं,
वह फैसला है —
किसे पास आने देना है
और किससे दूरी ही उसकी सुरक्षा है।
उसकी मर्यादा यह नहीं कि सिर झुका रहे,
बल्कि यह कि सिर कितना ऊँचा रखा जाए —
बिना घमंड के, बिना भय के।
मर्यादा उसकी हार नहीं,
उसकी वो चुप्पी है
जिसमें तलवार छिपी रहती है —
और जिसे वह तभी खींचती है
जब इज्ज़त की आख़िरी ईंट हिलने लगे।
क्योंकि वह जानती है —
दुनिया उसकी त्याग की नहीं,
उसकी सीमा की कद्र करती है।
मर्यादा वह वचन है —
जिसे स्त्री निभाती भी है और तोड़ भी देती है
जब कोई रिश्ते की आड़ में
उसकी आत्मा को चुभाने लगे।
वह आँच नहीं, अंगार है,
आँचल नहीं, ध्वजा है,
मर्यादा का सौंदर्य यह है —
कि वह सिर्फ स्त्री को सुरक्षित नहीं करती,
बल्कि स्त्री के भीतर की रानी को जीवित रखती है।
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