तो मेरे सफ़र का आख़िरी पड़ाव श्मशान क्यों लिखा गया?
हर जन्म में मुझे जन्म देने का वरदान सौंपा गया,
फिर इस देह को मिट्टी बनाकर मौन क्यों किया गया?
अगर प्यार का अर्थ जुदाई की पीड़ा है,
तो मेरी पलकों में मोहब्बत की पहली चमक क्यों बोई गई?
रूह को पता था कि उसके हिस्से में काँच ही आएगा,
फिर भी दिल में चाहत की नर्म रोशनी क्यों रोई गई?
जीना अगर मर जाने की प्रस्तावना है,
तो मेरी करुणा में इतना विस्तार क्यों रखा गया?
आँसू बोझ हैं, यह जानते हुए भी,
मेरी आँखों में समंदर का प्रसार क्यों रखा गया?
मैं स्त्री हूँ—
पलकों पर हज़ारों सपने रख सकती हूँ,
पर उन्हें दुनिया की आग में जलते देख भी हँस सकती हूँ;
फिर भी जब एक चेहरा भीड़ में अपना सा लगे,
तो मेरी आवाज़ में कंपकंपी क्यों घुल जाती है?
मिलन अगर नसीब की स्याही में लिखा ही नहीं,
तो उसी अनछुए के नाम पर मेरी साँसें समर्पित क्यों हो जाती हैं?
जिसने कभी हथेलियाँ नहीं थामीं,
वही मेरे हाथों की लकीर बनकर चमकता क्यों रहता है?
कभी पास वाले प्यार पूछना भूल जाते हैं,
और जो कभी मिले ही नहीं वो दिल के सबसे करीब बैठ जाते हैं;
जो व्यक्ति तकदीर में हो भी नहीं सकता,
उसी के कदमों में मेरे जीवन के व्रत क्यों जगते हैं?
मेरी रूह जानती है —
मोहब्बत की राहें फूलों से नहीं भेंटों से भरी हैं,
फिर भी मैं किसी नाम को दीपक बनाकर अंधेरों में थाम लेती हूँ,
क्योंकि मैं टूटना सीखकर भी किसी और को टूटने नहीं देती।
लोग कहते हैं —
स्त्री का दिल नाज़ुक होता है,
सच तो यह है कि वही सबसे मज़बूत होता है,
घायल होकर भी परछाएँ नहीं दिखाता,
चोट खाकर भी अहसास नहीं गिरने देता।
वही एक चेहरा, वही एक आवाज,
कभी जन्मों का करार लेकर आती है,
उम्र के हर पड़ाव पर समझदारी सिखाते हुए भी,
अंत में दिल को बचपन सा मासूम छोड़ जाती है।
इसलिए…
दिल नादान नहीं —
वह बहुत अनुभवी है,
बस वह चुनता है वही जिसे किस्मत रोक रही हो,
क्योंकि मंज़िल चाहे राख हो जाए,
स्त्री की मोहब्बत सफ़र को मंदिर बना देती है।
और शायद उसी का नाम ज़िंदगी है —
कि मैं जलते हुए भी उजाला बनूँ,
बिखरते हुए भी प्रार्थना बनूँ,
क्योंकि स्त्री प्यार हारती नहीं — वह अमर बनाती है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें