ये तो कई रास्तों का संगम है,
कभी धूप में तपते कदम हैं,
कभी चाँदनी में भीगा सा संगम है।
कभी ख्वाहिशों का पुल बनाते हैं,
कभी टूटे सपनों की मरम्मत,
कभी भीड़ में खो जाते हैं,
कभी तन्हाइयों में मिलती राहत।
कभी रास्ते हमारे इम्तिहान लेते,
कभी हम रास्तों का हाल पूछ लेते,
कभी कदम काँपते हैं डर से,
कभी हौसले मंज़िल से हाथ जोड़ लेते।
ये जीवन सिर्फ साँसों का नाम नहीं,
ये सांसों के बीच—
ठहरे हुए पल का महत्त्व है,
ये आँसू की भाषा समझकर,
मुस्कुराहट का धर्म निभाना है।
कभी हम पतंग बनकर उड़ जाते,
कभी उमंगों की डोर कहीं उलझ जाती,
कभी हवा हमारी दोस्त बन जाती,
कभी तूफ़ान हमें आज़माने आ जाती।
रास्ते में आती हैं ठोकरें—
पर गिरना भी कितना प्यारा होता है,
क्योंकि गिरते हुए ही समझ आता है,
कि अगली बार और संभलकर चलना होता है।
कभी मंज़िल हमारी तरफ बढ़ती है,
कभी हम मंज़िल की तरफ,
पर जीत तो वहीं है—
जहाँ थककर भी, रुककर भी,
दिल फिर आगे बढ़ने की कसम खाए।
इस सफ़र में लोग मिलते हैं,
कुछ साथ चलने का वादा करते,
कुछ बस मोड़ तक आते हैं,
और फिर याद बनकर
दिल के किसी कोने में बस जाते हैं।
जीवन एक यात्रा है...
पर इससे भी ज्यादा—
ये खुद को खोजने की कला है,
ये गिरकर भी फिर उठने की हिम्मत है,
ये अपनों की हँसी में स्वर्ग पाना,
ये अपनों के आँसू में खुद को खो देना है।
तो चलो...
आज थोड़ी उम्मीद जेब में रख लेते हैं,
थोड़ा प्रेम आँखों में,
थोड़ा भरोसा कदमों में,
और कुछ सपने दिल की गठरी में बाँधकर—
इस यात्रा को प्यार से जीते हैं।
क्योंकि अंत में…
न मंज़िल याद रहती है
न वह भारी सा सफर,
याद रहते हैं वो लोग,
जो साथ चले... थोड़ी दूर मगर
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें