शनिवार, 29 नवंबर 2025

महान नहीं इंसान बनना है मुझे


मैं उस शिखर की चाह नहीं रखती,
जहाँ तख़्त और शोहरत का धुआँ छाया हो।
मेरे कदम उस राह पर हैं,
जहाँ दर्द को समझने की गहराई हो,
जहाँ मुस्कान बाँटने की ताक़त हो।

महान बनना कोई मापदंड नहीं,
वो केवल शब्दों की चमक है।
पर इंसानियत,
वो जीवन की नर्म माटी में गहरी जड़ें है—
जो हर टूटे हुए दिल तक पहुँच सके।

मैं वह इंसान बनना चाहती हूँ,
जो किसी के डर में हाथ थाम सके,
जो किसी के ग़म में अपना आँचल बाँट सके।
मैं वह बनूँगी,
जो अपनी आवाज़ से नहीं,
अपने कर्मों से कहे—
“मैं यहाँ हूँ, तुम अकेले नहीं।“

महानता की चमक भले धधकती हो,
लेकिन इंसानियत की रोशनी,
जो चुपचाप जलती है,
वो सबसे गर्म, सबसे सच्ची है।

मैं किताबों में नहीं,
लोगों के दिलों में जीना चाहती हूँ।
महान नहीं, इंसान बनना है मुझे—
एक ऐसा इंसान,
जिसकी कोई तारीफ़ न करे,
लेकिन उसकी उपस्थिति,
किसी के जीवन में फर्क लाए।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें