बुधवार, 19 नवंबर 2025

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई



कहते हैं इतिहास ने
उनके घोड़े की टापों में
लोहा सुना था—
पर जो मैंने सुना,
वह था एक स्त्री का धड़कता हृदय
जो खुद तलवार बन गया था।

झाँसी…
जहाँ मिट्टी भी उनका नाम सुनकर
रथों की गूंज में बदल जाती।
जहाँ हवाएँ उनके केशों का
बस एक क्षण स्पर्श कर
युद्ध गीत बन जातीं।

पर आज मैं तुम्हें
वह रानी नहीं सुनाऊँगी
जिसे किताबों ने बाँध रखा—
मैं सुनाऊँगी वह लड़की,
जो काशी की गलियों में
पगडंडियों के बीच
चोटियों में चाँद बांधकर
धूप से लड़ती थी।

जिसने पहली बार
लकड़ी की तलवार उठाई
तो पेड़ों के पत्ते काँप गए—
जैसे जान गए हों
कि एक दिन यही हाथ
साम्राज्यों के सिंहासन हिला देगा।

कहते हैं वह युद्ध में घायल हुई—
पर क्या सच में?
मुझे तो लगता है
घाव भूमि को लगे होंगे,
आसमान को लगे होंगे,
समय को लगे होंगे—
क्योंकि एक स्त्री जो उठ खड़ी होती है
वह अपने साथ युगों को बदल देती है।

उस रात
जब उन्होंने घोड़े पर बाँधा अपना पुत्र,
तो वह घोड़ा जान गया था
कि आज इतिहास का सबसे कठिन सफ़र है।
और वह रात—
वह रात आज भी चुप है,
क्योंकि उसने
एक माँ का युद्ध देखा था।

कहते हैं उन्होंने प्राण त्यागे,
पर मैं कहती हूँ—
प्राण कहाँ जाते हैं?
वे तो लौट आते हैं
हर उस लड़की की आँखों में
जो अन्याय पर मुट्ठी बाँधती है,
हर उस स्त्री की चाल में
जो डर पर पाँव रखकर आगे बढ़ती है,
हर उस माँ की सांस में
जो अपने बच्चे के भविष्य को
सीने से लगाकर ढाल बन जाती है।

लक्ष्मीबाई मरी नहीं—
वह फैल गई है।

मिट्टी में, रक्त में,
समय की धड़कन में,
और उन सभी स्त्रियों के अस्तित्व में
जो अब किसी महल की रानी नहीं—
अपने फैसलों की रानी हैं।

झाँसी की रानी…
तुम्हारी कहानी मैं नहीं लिख रही—
तुम मेरे भीतर लिख रही हो।

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