समाज के उन चार ऊँची आवाज़ों वाले लोगों से,
जो बिना पहचान, बिना कहानी
बस चाल चलन का हक़ जताते फिरते हैं।
मैं डरती हूँ...
उन अपने कहे जाने वालों से,
जो मेरे ही घर की चौखट पर खड़े होकर,
दूसरों के शक़ की धूल
मेरे चेहरे पर पोत देते हैं।
मैं नहीं घबराती उन राह चलतों से,
जो न नाम जानते, न मेरा अतीत,
पर टोपी को ताज समझ
अहंकार से फैसले सुनाते हैं।
मैं घबराती हूँ…
उन मुस्कुराती निगाहों से,
जो साथ तो देती हैं मेरे,
पर विश्वास नहीं —
क्योंकि उन्हें डर है समाज के चार सवालों का!
मैं सामने लड़ लूँगी पूरी दुनिया से,
उन हथियारों से, उन नज़रों से, उन तानों से —
पर टूट जाती हूँ तब,
जब मेरी अपनी जुबान
दूसरों की भाषा बोलने लगती है।
मैं काबिल हूँ,
मेरे सपने गवाही देते हैं,
मेरे कदम मेरे हक़ की दास्तान लिखते हैं।
पर क्यों?
किसी और की दलील से
मेरी पहचान जज की कुर्सी पर बिठाई जाती है?
मैं नहीं डरती किसी भीड़ के हंगामे से,
मैं डरती हूँ उस ख़ामोशी से,
जो मेरे अपने ओढ़ लेते हैं
बस इसलिए कि
लोग क्या कहेंगे?
आज मैं ऐलान करती हूँ —
मेरे किरदार की अदालत मेरी आत्मा होगी,
मेरी इज्ज़त के फैसले मेरे यकीन करेंगे।
जो समझे वो अपना,
जो न समझे वो भी अपना,
पर मेरे वजूद की सूरत
अब कोई और तय नहीं करेगा।
क्योंकि मैं वही हूँ —
जिसे खुद की आँखों में
कभी शर्मिंदा नहीं होना।
आज से…
मैं डरती नहीं,
मैं बस जीती हूँ—
खुद के लिए,
खुद से आगे,
खुद में पूरी! ✨
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