वक़्त की दीवारों पर हथेलियों की गूंज से बनी हुंकार हूँ,
मैं रौशनियों की भीड़ में एक तिलिस्म-सी पहचान हूँ।
मैं कमज़ोरी नहीं, शौर्य की अडिग तलवार हूँ,
दबी आवाज़ों का सच, खुले आकाश की पुकार हूँ।
घर की दहलीज़ से आगे बढ़ती
हर कदम में आने वाले तूफ़ानों की हुंसी हूँ,
मैं रीतियों से नहीं बंधती—
नये नियमों को जन्म देती एक अग्निशिखा सी हूँ।
मैं चुप रहकर भी,
अंदर उठते तूफ़ानों की गर्जना बन जाती हूँ,
जो मुझे चुनौती दे,
मैं उसी की परछाईं में क्रांति लिख जाती हूँ।
मैं न शिकायत, न संकोच की दीवार,
मैं हर सवाल का जिंदा जवाब हूँ— बेधड़क, बेक़रार।
मौत से भी आगे जीने की हिम्मत,
मैं जीवन का नया विस्तार हूँ।
मैं सिर्फ़ देह नहीं—
मैं विचारों का धधकता ब्रह्माण्ड हूँ,
धरती और गगन के बीच
साहस से खड़ा एक अनुपम संतुलन हूँ।
मैं थकती हूँ… पर रुकती नहीं,
मैं टूटती हूँ… पर झुकती नहीं,
मैं हार के बाद की जीत की क़िस्मत लिखने वाली
अडिग चिंगारी हूँ।
मैं स्त्री नहीं,
समय के सीने पर दर्ज इंकलाब की फुंकार हूँ,
मैं इतिहास लिखने वाली
एक अनसुनी, अमर हुंकार हूँ।
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