हमेशा सीधी ही रहती है…
टूटते हैं मोड़ तो मन के भीतर,
जहाँ बचपन की धूल,
यादों की गंध
और अधूरी इच्छाओं की परछाइयाँ
अब भी बैठी होती हैं।
रास्ता कभी पूछता नहीं
कि तुम थकी हो या टूटी—
वह तो बस चुपचाप आगे बढ़ता रहता है…
सवाल मन पूछता है,
कि कहाँ मुड़ना है,
कहाँ ठहरना है,
कहाँ अपनी ही कहानी को
पुनः लिख देना है।
कभी-कभी लगता है
कि कठिनाई रास्तों में है,
पर असल में—
लड़ाई तो भीतर की है,
जहाँ डर अपनी जड़ें जमाए बैठा है,
और साहस रोज़ नया बीज बोता है।
हम मोड़ों से नहीं हारे,
हम तो अपने ही मन से हारे थे—
वही मन जिसने कभी
बहुत जोर से कहा था
कि “तुम नहीं कर पाओगी,”
और उसी मन ने किसी दिन
धीरे से फुसफुसाकर कहा—
“चलो, अब उठो…
तुम ही करोगी।”
जीवन की राह सीधी है,
पर स्त्री का मन—
वह तो पूरा ब्रह्मांड है,
जहाँ एक ही क्षण में
सपनों की उड़ान भी जन्म लेती है
और पीड़ा का मौन भी।
मगर यही मन
जब अपने मोड़ों को स्वीकार लेता है,
जब अपने ही मौसमों को पहचान लेता है,
तो राह अचानक
उजले रंगों में खिल उठती है।
क्योंकि सच तो यही है—
रास्ते कभी मुश्किल नहीं थे,
हम ही अपने भीतर
बहुत लंबा चक्कर काटते रहे।
अब जब मन साफ़ है,
तो हर मोड़ सुंदर है…
और हर कदम
अपना सा।
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