मंगलवार, 25 नवंबर 2025

गलतफहमियों की गठरी

गलतफ़हमियों की गठरी सिर पर मत लादना,
ये दुनिया सवालों की है, जवाबों की नहीं —
यहाँ हर रिश्ता आईने सा दिखता है,
पर सच में कोई किसी का प्रतिबिंब भी नहीं।

लोग मुस्कुराते हैं, पर दिल में मौसम अलग चलते हैं,
जहाँ भरोसा खरीदा– बेचा जाता है,
और अपनापन शब्दों से नहीं,
सुविधाओं से मापा जाता है।

इस जमाने में कोई किसी का नहीं होता —
किसी ने किसी को छोड़ा नहीं,
बस उतनी ही देर साथ चलें जितना फायदा हो,
फिर “भाग्य” का नाम देकर रास्ता बदल लिया जाता है।

इसलिए, रिश्तों की गठरी में उम्मीदें मत भरना,
इनसे ज़्यादा भारी बोझ दुनिया में कुछ नहीं —
जो लोग दिल के क़रीब लगते हैं,
वे कभी–कभी सबसे दूर पाए जाते हैं।

साथ वही होते हैं जो बिना शोर के साथ हों,
जो तालियों को नहीं, तुम्हारी ख़ामोशी को सुनें —
बाक़ी तो सब राहगीर हैं,
नामों के किरदार हैं, पर जीवन में नहीं।

इसलिए रोओ मत, टूटो मत,
किसी का बदल जाना तुम्हारी हार नहीं —
बस इतना समझ लो,
इंसान के बदलने का मौसम आकार में नहीं आता,
वो एहसासों में आता है।

चलो हल्के चलें, बिना शिकायत, बिना उधार —
रिश्तों को कैद नहीं, आज़ाद रहने दो,
जो सच में अपने हैं वे पीछे नहीं छूटेंगे,
और जो छूट गए…
वे कभी अपने थे ही नहीं।

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