जहाँ चीखें आवाज़ नहीं बनतीं,
आँसू पानी नहीं रह जाते,
और दिल टूटता नहीं…
वह बस एक दिन
थककर, चुपचाप
मर जाने जैसा स्थिर हो जाता है।
पर मरता कहाँ है वह?
दिल तो एक जीवित कब्र है—
जिसमें उम्मीदें दफन होती हैं,
चाहतें सिसकती हैं,
और यादें मिट्टी की तरह
धीरे-धीरे जम जाती हैं।
लोग कहते हैं—
“दिल टूट गया है।”
पर सच यह है कि
दिल तो हर बार टूटकर भी धड़कता है,
हर बार गिरकर भी उठता है।
जो सच में मरता है,
वह उम्मीद होती है…
वह सपने होते हैं…
वह खोई हुई मासूमियत होती है
जो किसी की हथेली पर रखकर
भरोसा कर बैठती है।
दर्द की हद से आगे
एक शांत अंधेरा बस जाता है,
जहाँ कोई आहटक नहीं होती,
कोई दौड़भाग नहीं होती—
बस एक लंबी, ठंडी खामोशी
जो मन के भीतर ही मन को खा जाती है।
दिल तभी नहीं मरता,
दिल बदल जाता है।
वह सीख जाता है
कि किसे करीब आने देना है,
किसे नहीं।
वह सीख जाता है
कि मुस्कान भी कवच होती है,
और चुप्पी भी दवा।
दर्द की हद से आगे
एक ऐसा नुकीला सच खड़ा होता है
जो कहता है—
“अब कोई दूसरा तुम्हें तोड़ नहीं सकता,
क्योंकि तुमने अपना सबसे कोमल हिस्सा
यहीं कहीं दफना दिया है।”
और जब दिल का सबसे पवित्र हिस्सा
तुम खुद मिट्टी में उतार आते हो,
तो दुनिया के तीर तुम्हें भेद नहीं पाते।
दुनिया समझती है—
“दिल कठोर हो गया है।”
पर तुम जानते हो—
वह कठोर नहीं,
बस थक चुका है।
अब तुम दर्द से नहीं टूटते—
तुम बस चुप हो जाते हो।
किसी का जाना, किसी का धोखा,
तुम्हें रुलाता नहीं,
तुम्हें बस थोड़ा और खाली कर देता है।
उस खालीपन में
एक नई आत्मा जन्म लेती है—
जो प्रेम मांगती नहीं,
स्वीकार करती नहीं,
बस अपने भीतर
खुद को टटोलती रहती है।
और एक दिन
दिल की उस कब्र से
एक नया व्यक्ति निकलता है—
जो दुख में नहीं,
सहन में जीना सीख लेता है।
तुम कहती हो—
“दिल मर गया है…”
पर सच्चाई?
दिल मरता नहीं।
दिल बस इतना शांत हो जाता है
कि दुनिया को लगता है
वह धड़कना छोड़ चुका है।
और उस शांत धड़कन में
तुम्हारी सबसे बड़ी ताकत छिपी होती है।
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