मंगलवार, 25 नवंबर 2025

समय की सिलवटों पर खुद को कैद मत करना

समय को जीवन मत समझो,
वह सिर्फ़ एक नाप है —
उम्र की, दिन की, सांसों की नहीं
फैसलों की।

किसी कैलेंडर के पन्ने फट गए
तो यह मत समझो कि अवसर भी फट गए,
क्योंकि अवसर काग़ज़ों के नहीं,
चेतना के बच्चे होते हैं।

तुम्हारे भीतर जितनी बार
यह प्रश्न उठे —
“अब क्या मैं देर कर चुका हूँ?”
उतनी ही बार आत्मा धीरे से कहती है —
“समय तो बनाया तुमने था,
तोड़ेगा भी तुम ही।”

लोग कहते हैं — समय बदल जाता है,
पर सत्य यह है,
समय वही रहता है,
हम ही बदलते हैं,
और जो खुद को नहीं बदलते
वे समय पर आरोप लगा देते हैं।

समय की सिलवटों में कैद होना
खुद के विरुद्ध दिया गया फ़ैसला है,
जैसे कोई पेड़ अपनी छाया में
खुद को उगने से रोक दे।

तुम्हारे भीतर जो अनंत है
वह किसी घड़ी से छोटा कैसे हो सकता है?
तुम विश्व हो,
सृष्टि हो,
और समय — तुम्हारा छोटा सा मानचित्र।

अगर आत्मा जाग रही हो
तो कोई क्षण देर नहीं होता,
और अगर आत्मा सो गई हो
तो कोई क्षण सही नहीं होता।

इसलिए घड़ी को मत देखो,
स्वयं को देखो।
क्योंकि समय तब जीता है
जब तुम हार मानते हो,
और समय तब झुक जाता है
जब तुम खड़े हो जाते हो।

याद रखना —
भविष्य समुद्र की तरह है,
उस पर पुराने कदमों के निशान नहीं टिकते।
बीता हुआ पल पत्थर नहीं,
विचार है —
और विचार केवल त्यागने से मरते हैं।

सो, स्वयं को मुक्त कर दो
उन सिलवटों से जो तुमने ही गढ़ी थीं।
खड़े हो जाओ अपने अस्तित्व के केंद्र पर
और कहो —

“मैं समय की क़ैद में नहीं,
समय मेरे क़दमों की दिशा में है।”

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