दुनिया स्त्री को
सिर्फ देह का नाम क्यों देती है?
जबकि देह तो उसका सबसे छोटा हिस्सा है;
उसके भीतर जो चुप रहता है,
वही सबसे ऊँची आवाज़ है।
स्त्री—
वह सिर्फ जन्म नहीं देती,
वह अस्तित्व की पहली परिभाषा है।
समय उसके भीतर
धीमे-धीमे कदम रखकर चलता है,
और दुनिया समझती है
कि सिर्फ एक बच्चा जन्मा है।
उसे नहीं पता
कि समय की ही एक नई शाखा निकली है।
पुरुष जब कहता है—
“स्त्री खराब है,”
तो दर्शन मुस्कुराता है
क्योंकि वह जानता है
कि जो सत्य को जन्म देता है
वह स्वयं कभी असत्य नहीं हो सकता।
मानवता का पहला घर
न कोई मिट्टी की झोपड़ी था,
न कोई सिंहासन,
न कोई राज्य—
मानवता का पहला घर
एक स्त्री की देह थी।
जहाँ जीवन ने पहली बार
अपने लिए एक खिड़की खोली थी।
फिर भी,
युगों की विडंबना देखो—
जिस कोख को ब्रह्मांड का द्वार माना गया,
उसी कोख को
दुनिया ने बंद दरवाज़ा घोषित कर दिया।
स्त्री की देह
कभी कैद नहीं रही,
दुनिया की सोच कैद रही—
और हर बार
उस सोच ने उसे छोटा कहा
क्योंकि वह उसकी विशालता से डरती थी।
दार्शनिकों ने कहा है—
“जिसे तुम समझ नहीं पाते,
उसे या तो देवता बना देते हो
या दोष।”
स्त्री दोनों बन गई,
पर कभी मनुष्य नहीं बनने दी गई।
पर सच यह है—
स्त्री मनुष्य नहीं,
मनुष्य का मूल सूत्र है।
वह पृथ्वी नहीं,
पृथ्वी को अर्थ देने वाली गुरुत्वाकर्षण है।
वह पानी नहीं,
पर हर प्यास उसके कारण समझ में आती है।
वह प्रार्थना नहीं,
पर प्रार्थना का जन्म उसी से होता है।
जब पुरुष दुनिया जीतने निकला,
स्त्री ने चुपचाप
उसके भीतर से डर निकालकर
उसके पैरों में साहस रख दिया।
और जब वह जीतकर लौट आया,
तो उसी स्त्री ने
अपने आँचल में उसके अहंकार को भी जगह दे दी।
इसलिए नहीं कि वह कमज़ोर थी,
इसलिए कि वह जानती थी—
अहंकार भी एक बच्चा होता है,
जिसे समय के आँचल में पनपकर
एक दिन स्वयं गिर जाना होता है।
स्त्री—
वह सत्य है
जिसे इतिहास ने लिखा नहीं,
दर्शन ने पढ़ा नहीं,
और विज्ञान ने पूरा समझा नहीं।
वह वह प्रश्न है
जिसकी गहराई से
उत्तर भी डरता है।
वह वह शांति है
जिसे भूकंप भी बदल नहीं सकता।
और जो दुनिया कहती है—
“स्त्री खराब है,”
उसे यह नहीं पता
कि जो तुम्हारे भीतर
पहली साँस बनकर प्रवेश करती है,
वह कभी खराब नहीं हो सकती।
खराब तो वे दृष्टियाँ हैं
जो स्त्री को देखने से पहले
उसे जज कर लेती हैं।
खराब वे मन हैं
जो स्त्री की देह देखते हैं
उसकी चेतना नहीं।
स्त्री चेतना—
वह ब्रह्मांड का पहला प्रकाश है,
जो किसी मंदिर में नहीं,
किसी आकाश में नहीं,
किसी किताब में नहीं—
एक स्त्री के भीतर जलता है।
और इसलिए,
जब भी कोई कहता है
कि औरत ही ग़लत है,
तो समय हँसकर जवाब देता है—
“जिसे तुम दोष देते हो,
उसी ने तुम्हें दुनिया में प्रवेश कराया था।”
स्त्री—
वह रहस्य है,
वह मार्ग है,
वह मंज़िल है,
वह प्रश्न भी
और समाधान भी।
और सबसे बड़ी बात—
वह अपनी कीमत किसी से नहीं मांगती,
वह खुद ही अपनी कीमत है।
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