सोमवार, 17 नवंबर 2025

जो भी मिले सच्चे मिले

बेशक लोग कम मिले,
पर जो भी मिले—मेरी आत्मा की देहरी पर
नंगे पाँव आए।
उनके शब्दों में कोई शोर नहीं था,
सिर्फ़ इतनी-सी नर्मी थी
कि मेरे भीतर का टूटा हिस्सा
धीरे-धीरे भरने लगा।

कितनी अजीब बात है—
भीड़ ने मुझे कभी अपनी नज़रों में नहीं रखा,
पर जो दो-चार चेहरे ठहरे,
उन्होंने मुझे मेरी ही नज़रों में लौटा दिया।

वे लोग कम थे,
पर उनमें एक अनकही पवित्रता थी—
जैसे सूनी दुपहर में अचानक आती
हल्की पीली धूप,
जो बिना पूछे
मन के भीतर की ठंडक उतार देती है।

वे लोग जब हाथ नहीं बढ़ाते थे
तब भी साथ देते थे;
जब बोलते नहीं थे
तब भी सुन लेते थे।
अजीब है न—
दिल समझने वाले बस कुछ ही होते हैं,
पर वही ज़िंदगी भर की थकान उतार देते हैं।

मेरी राहों में ज़्यादा आवाज़ें नहीं थीं,
पर जो कदम साथ चले
वो मेरी चुप्पियों तक को पढ़ गए।
उन्होंने मेरे भीतर के बिखराव को
गुनगुनाकर समेटा,
और मेरे अकेलेपन में
एक सुकून की लौ जला गए।

ज़िंदगी ने मुझे भीड़ नहीं दी—
मगर दिल से मिले लोग दिए।
और यही लोग मेरे भीतर
एक धीमी, कोमल रोशनी की तरह
आज भी जलते रहते हैं।

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