हमें कौन-सा दुनिया में दोबारा आना है।
जो तुझसे सीखा है, वही तो कमाई है,
हर दर्द में छिपी एक नई सच्चाई है।
कभी तू पतझड़ बन आई,
कभी बहार के गीत सुनाए,
कभी छीन लिया सब कुछ मुझसे,
कभी आँसूओं को भी दुलराए।
तूने मुझे गिराया भी,
पर गिरकर उठना सिखाया भी,
हर ठोकर में तेरी दस्तक थी,
हर आँधी में इक नया रास्ता भी।
मैं जानती हूँ,
तू मुझे आज़माती रहेगी,
कभी सपनों में, कभी अपनों में,
कभी वक़्त के सूनसान गलियारों में।
पर मैं अब डरती नहीं,
तेरे तानों से, तेरे बहानों से,
क्योंकि टूट-टूट कर भी
मैंने जीना सीखा है इन इम्तहानो से।
सता ले जितना, ऐ ज़िंदगी,
तेरी सारी चालें पहचान ली हैं,
हर आँसू की कीमत समझी है,
हर मुस्कान में आँच झेली है।
तू समझती है कि मैं हार जाऊँगी,
पर मैं वही हूँ जो राख से खिलती है,
तेरे दिए ज़ख्मों को फूलों-सा सींचती है,
और खुद में फिर एक नई रौशनी बुनती है।
मत सोच कि तेरा कोई वार भारी होगा,
मैं तो उसी दर्द से नई चिंगारी बनाऊँगी,
जहाँ तेरा अंधेरा थककर रुकेगा,
वहीं मैं अपना सूरज जलाऊँगी।
सता ले, जितना सताना है,
अब शिकवा भी नहीं, तेरा ताना भी नहीं,
क्योंकि अब जो मैं बन गई हूँ,
वो तेरे बिना सम्भव ना थी कहीं।
तू अपनी आग दे, मैं उसे दीप बना लूँ,
तू आँधी दे, मैं उसे गीत बना लूँ,
तू दुःख दे, मैं उसे दर्शन बना लूँ,
तू मौन दे, मैं उसे अर्थ बना लूँ।
सता ले, ऐ ज़िंदगी, जितना सताना है,
हर बार जलकर भी मुस्कुराना है,
क्योंकि हमें कौन-सा दोबारा आना है,
बस एक ही जन्म है — और उसे जी जाना है।
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