पर छूकर समझ आने वाली चीज़ नहीं,
देखकर आँकी जाने वाली कोई आकृति नहीं।
मैं देह तो हूँ,
पर देह के भीतर
सदियों से सुलगता हुआ
एक अनकहा सत्य भी हूँ।
मेरी देह पर मत लिखो इतिहास—
मेरे मन की भूलभुलैया में उतरकर देखो
कि कितने जन्मों की थकान
मेरी आँखों में चुपचाप सोई है।
मैं वह धूप हूँ
जो हर बार जली भी,
और हर बार उजली भी।
मैं स्त्री हूँ—
मेरे भीतर वह आत्मा है
जो हर सुबह टूटे हिस्सों को
अपने ही हाथों जोड़कर
फिर से चलना सीखती है।
मैं अपनी जीतें बाँट नहीं देती,
और अपने दुख किसी पर थोपती भी नहीं—
मैं बस उन्हें भीतर रखकर
थोड़ी और मजबूत हो जाती हूँ।
मेरे कंधों पर जो दिखता है, वह भार है,
जो नहीं दिखता—वह ब्रह्मांड है।
दुनिया समझती है
कि मेरा अस्तित्व मेरे चेहरे,
मेरे रंग,
मेरी चाल-ढाल में छिपा है—
पर सच यह है कि
मेरी असली खूबसूरती
मेरे इनकार में है,
मेरे इकरार में है,
मेरे हर दिन हारकर भी
फिर उठ खड़े होने में है।
मैं स्त्री हूँ—
पर शर्म का नाम नहीं,
सहन का दूसरा अर्थ नहीं,
त्याग का हमेशा खुला हुआ दरवाज़ा नहीं।
मैं वह रास्ता हूँ
जो खुद बनता है,
खुद मुड़ता है,
खुद तय करता है
कि किस दिशा में जाना है।
मैं मात्र देह नहीं—
देह तो सिर्फ एक परदा है,
अंदर जो चलता है
वह तूफ़ान है,
आग है,
धारा है,
और सबसे ज़्यादा
मेरी अपनी इच्छाओं का शोर है।
मेरी ख़ामोशी मत पढ़ो,
उसके भीतर कई बार
चिल्लाहटें दबी होती हैं,
और कई बार
इतनी गहरी शांति
कि कोई पर्वत भी शर्मा जाए।
मैं वही स्त्री हूँ
जिसने दुनिया को जन्म दिया,
पर दुनिया ने मुझे
अक्सर नज़रअंदाज़ किया।
फिर भी मैं टूटी नहीं,
मुड़ी नहीं—
बस अपनी आवाज़
थोड़ी और साफ़ कर ली।
और सुनो—
मैं किसी का प्रतिरूप नहीं,
किसी का प्रतीक नहीं,
किसी का अधिकार नहीं,
मैं केवल मैं हूँ—
एक पूरे आकाश की तरह
असीम, उन्मुक्त, अनलिखी।
मैं स्त्री हूँ,
मात्र देह नहीं।
मैं वह कविता हूँ
जो देह से नहीं,
दिल की राख से उठती है—
और हर जन्म में
खुद को फिर से लिख देती है।
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