सोमवार, 24 नवंबर 2025

छुपे हुए पन्नो का सच

हर कोई अपनी ज़िंदगी का
एक पन्ना मोड़कर रख देता है,
जहाँ आँसू स्याही बन जाते हैं
और यादें अल्फ़ाज़ों से लड़ती रहती हैं।

कोई हँसता है महफ़िलों में
पर भीतर उसका काग़ज़ तपता है,
जिस पर किसी टूटन की खामोशी
धीरे-धीरे जलती रहती है।

कोई झूमता है दुनिया के संग
जैसे खुशियों का पहाड़ हो,
पर उसका छुपा हुआ किस्सा
किसी खाई में पड़ा कराहता है।

किसी के पास आधे ख़्वाब हैं,
किसी के पास टूटा बचपन,
किसी की मुस्कानों के नीचे
लहूलुहान मन के विजन।

हम सबके सीने में
एक अनकहा सच साँस लेता है,
जिसे हम दिखाते तो नहीं
पर हर रात वही रोता है,
वही सोता है।

ज़िंदगी चमकदार नहीं होती
सिर्फ फोटो और फ्रेम्स में,
कुछ तस्वीरे दिल में भी होती हैं
जो किसी एलबम में नहीं मिलतीं।

हम सब अपने-अपने दर्दों के
धीमे पाठ पढ़ते रहते हैं,
बिना बोले, बिना किसी गवाह के
उन किस्सों को जीते रहते हैं।

और यही तो इश्क़ है—
खुद से, खुद के हिस्सों से,
अपने छिपे पन्नों को
धीरे-धीरे पढ़ना सीख जाना।

कभी जो हिम्मत हो तो
इन तहों को खोलकर देखना,
कहीं कोई आँसू नहीं—
बस इंसान मिलेगा…
तुम्हारी तरह… बिल्कुल तुम्हारी तरह।

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