बुधवार, 28 दिसंबर 2016

सकून नही मिला

ना होठो पर शिकायत होगी
ना आँखों से शिकवे गिरेंगे।
कुछ इस तरह से तेरे हर एक
अहसान अब अदा हम करेंगे।।

तुम्हे मिला के सबसे एकदिन
दूर हम खुद से हो जाएंगे।।
ख़ुशी लाकर तुम्हारे जहाँ में
खुद दुनियां को छोड़ जाएंगे।।

कुछ इस तरह से तेरे एहसान
देख लेना तुम हम चुकाएंगे।
रश्मो कसमो से बांधो मुझको
हम रवायतों को छोड़ जाएंगे।।

मुझे किसी से भी गिला नही
सकून की बात मत कर यारो
यही वो चीज है जहाँ में जो
हर एक शख्श को मिला नही।।

#शुभसंध्या

सकून नही मिला

ना होठो पर शिकायत होगी
ना आँखों से शिकवे गिरेंगे।
कुछ इस तरह से तेरे हर एक
अहसान अब अदा हम करेंगे।।

तुम्हे मिला के सबसे एकदिन
दूर हम खुद से हो जाएंगे।।
ख़ुशी लाकर तुम्हारे जहाँ में
खुद दुनियां को छोड़ जाएंगे।।

कुछ इस तरह से तेरे एहसान
देख लेना तुम हम चुकाएंगे।
रश्मो कसमो से बांधो मुझको
हम रवायतों को छोड़ जाएंगे।।

मुझे किसी से भी गिला नही
सकून की बात मत कर यारो
यही वो चीज है जहाँ में जो
हर एक शख्श को मिला नही।।

#शुभसंध्या

सकून नही मिला

ना होठो पर शिकायत होगी
ना आँखों से शिकवे गिरेंगे।
कुछ इस तरह से तेरे हर एक
अहसान अब अदा हम करेंगे।।

तुम्हे मिला के सबसे एकदिन
दूर हम खुद से हो जाएंगे।।
ख़ुशी लाकर तुम्हारे जहाँ में
खुद दुनियां को छोड़ जाएंगे।।

कुछ इस तरह से तेरे एहसान
देख लेना तुम हम चुकाएंगे।
रश्मो कसमो से बांधो मुझको
हम रवायतों को छोड़ जाएंगे।।

मुझे किसी से भी गिला नही
सकून की बात मत कर यारो
यही वो चीज है जहाँ में जो
हर एक शख्श को मिला नही।।

#शुभसंध्या

रविवार, 25 दिसंबर 2016

दिल बंजारा सा

दिल बंजारा सा
घूमता आवारा सा
गलियाँ गलियाँ शहर शहर
कभी इस पहर कभी उस पहर
कभी इधर ठहर कभी उधर ठहर
दिल बंजारा सा...
जाने क्या ढूंढे जाने क्या चाहे
जाने किस तरह जाती है ये
अनजान सी गुमसुम सी राहे
ये अजनबी राहे
खड़ी है फैलाये बाहें
फिर भी दिल बंजारा सा...
हर बस्ती का एक चौराहा
चार दिशाएं ले जाए
खुशियों की दस्तक दे मुझको
वो मंजिल कैसे हम पाये
कभी रुकी रुकी कभी
भागमभाग ये दिल बंजारा सा...
नादान है दिल ना समझ है मन
बेसुध सा है जीवन का प्रण
कभी समझ के समझे
कभी उलझ गए
जाने कब संवरे
कब बिखर गए
कभी बहक बहक
कभी संभल सम्भल
ये बंजारा सा दिल
घूमता आवारा सा...

गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

क्या नही देखा

कैसा आसमान देखा
सोया हुवा जमीर और
गिरता हुवा इंसान देखा
सुख के खातिर चीर हरण
और गिरता हुवा ईमान देखा
नारी की चीत्कार पर
हँसता हुवा ईमान देखा।
दौलत की दौड़ में
भागता हुवा बेईमान देखा
भाई भाई का नही
बहन की विसात क्या
रिश्ते पैसे पर टिकी
बिन दौलत के औकात क्या
सच आँखियो का तजुर्बा देखो
देखा सब पर चुप
आज भी गुमसुम
कल भी चुप चुप
#ये_कलयुग_है_भाई

#शुभरात्री

शनिवार, 17 दिसंबर 2016

भाव

जब जब मेरे भाव मेरे शब्द बनते है
अनगिनत बातें निकलती है
अनगिनत कहानियाँ बनती है
कभी समाज की रीत
तो कभी सद्भावना और प्रीत बनती है
रोज कुछ भाव उभरते
रोज कुछ गीत बनते
कुछ कहते कुछ सुनते
रोज उभरते भाव...
सोचती हूँ भावनाओ की
की मोती से माला बनाऊ
लगा दूँ हाट और बाजार में
फिर देखूँ कितने रिश्ते लगते है
कतार में भावनाओ को खरीदने
क्योंकि अनमोल चीजे कोई अब लेता नही
बिकता है जो दाम से वही चलता है
संसार में....
#आभार_के_साथ_शुभ_रात्री

बुधवार, 14 दिसंबर 2016

गुमनामी

मुझे पार जाना है
सोच के पार
तुम्हारी इसकी उसकी सबके सोच
से आगे
जहाँ से दायरा और दिवार
दोनों के ही सीमाओ का
अतिक्रमण होता है
बेतुके सवालो
और बेतुके ख़यालो
से बहुत दूर
अपनी बनाई हुयी
मर्यादित दुनियां में
हा सच मुझे दूर जाना है
बहुत दूर
जहाँ हँसने के लिए
झूठ ना हो
जहाँ गाने के लिए
गम ना हो
जहाँ रोने के लिए
अपमान व तिरस्कार ना हो
जहाँ झूठे सपने व
झूठा प्यार ना हो
हा जाना है मुझे
चेखवो की दुनिया में
सच जीने
सच में ही रहने
मुझसे रिश्तों का तिरस्कार
सहा नही जाता
भावनाओ की चीत्कार
सही नही जाती
गुमनामी मुझे रास नही आती
नाम के खातिर फरेब करूँ
मुझे मंजूर नही
क्योंकि इस फरेबी दुनियां में
सच्चाई का अब दस्तूर नही।।

मंगलवार, 29 नवंबर 2016

टूटते सपने

रोज बुनती हूँ सपने
इरादों के मजबूत धागों से
एक एक जिरह बाँधती हूँ
मजबूत इरादों से
कही जो झरोखा नजर
आये तो एक एक जिरह
खोलती हूँ..
कुछ इस तरह से मैं
रोज अपने सपने तोड़ती हूँ
उम्र गुजर गयी धागों
को खोलते बुनते
पर आज भी सपने
अधूरे ही रहे...
टाट की पैबन्द से
कबतक छुपाऊँ आँखों
की नमी अपनी
किसको और कैसे बताऊँ
मैं कमी अपनी..
उलझे धागों की गाँठो
को रोज तोड़ती जोड़ती हूँ
कुछ इस तरह से मैं रोज
अपने सपने तोड़ती हूँ..
रिश्तों नातो की भीड़ में
मैं ऐसे खोई...
खुद अपने सपने तोड़ कर
मैं बहुत रोई...
ये ताने बाने तो जिंदगी के
चलते ही रहेंगे..
जबतक है कायनात
सपने पलते ही रहेंगे
मेरी ज़िरह ही मेरी बगावत होगी
अदावते रियायतें तो चलते
ही रहेंगे...
ऐसी बातों से ही खुद को
झकझोरती हूँ...
मैं इस तरह से रोज एक सपने
तोड़ती हूँ..

जिंदगी

कभी शहद सी मीठी
तो कभी नीम सी कड़वी जिंदगी
महसूस तो होती होगी
जो आँखे रोज हँसती है
मुमकिन है कभी रोती
तो होंगी....
अपनों का प्यार
वक्त के मार पर भारी
पड़ जाता है...
कुछ मिले ना मिले पर
जख्म कुछ हल्का हो जाता है
मैं किस्सा नही हकीकत हूँ
वक्त को देखा है
रंग बदलते
स्वाद बदलते
कभी थमते तो कभी
बिना पंखो के उड़ते...
बोझिल होते तो कभी
सपनो में खोते..
हर रंग हर साँचे में ढलते
हर जेहन में पलते
हा आँखो की नमी से
रीस रीस के निकलते
नीम सी कड़वी जिंदगी को
शहद में बदलते...
सतरंगी सपनों में खोती
तो कभी थक के चूर
होती जिंदगी...
रंग बदलती जिंदगी...

मंगलवार, 22 नवंबर 2016

तजुर्बा

हमने तो जो भी लिखा तजुर्बा ही लिखा।
सीख लो जीवन क्या है और जीना क्या।।

जब ग़मे जिंदगी से बहाली ना मिले तो।
पतझड़ क्या सावन क्या  महीना क्या ।।

हम तो ढूंढते ही रहे फ़क़त उजाले हरदम।
मिले जो नूर तो क्या और नगीना भी क्या।।

तमाम उम्र गुजर गयी सम्भालते खुद को।
इस जिंदगी में पाना क्या और खोना क्या।।

जो मिला कबूल है मुझको गम हो या ख़ुशी।
खुदा तेरे दरबार में अब रो रो कर जीना क्या।।

रविवार, 6 नवंबर 2016

मेरा कौन???

कभी ख़ामोशी में पूछना
खुद से या जमीर से
ये जो तुम अपनेपन का
दम भरते हो
क्या सचमुच तुम मुझपर
यकीन करते हो।
दिखावे की आँच में झुलसता
जमीर मेरा है
सच कह रही हूँ
बस जी भर रही हूँ
जीने के लिए आई थी
उम्मीद का चोला पहन कर
उतार के रख दिया
यकीन मानो तुमने मुझे
मार के रख दिया।

तुम्हे सब यूँ ही लगता है
पर पलट के देखो तो
किसी का आस जलता है
सब तो तुम्हारे है
और तुम सबके
मेरा कौन??
मेरा अस्तित्व आज फिर
मौन।

जीने की चाह में सबकुछ
गवा दिया
एक बार फिर मैंने
खुद को मिटा दिया।।

शुक्रवार, 4 नवंबर 2016

रंजोगम दिल से मिटा दो तो नजर आऊँगी

मै आइना ही हूँ एक ठोकर से टूट जाऊँगी।        जज्बात नही बिखर के भी निखर जाउंगी।।

सलामतें उनके लिए मांगो जिन्हें जरूरत हो।
मै हूँ एक रूह बांधोगे तो भी भटक जाउंगी।।

हर एक शै से यहाँ उठती है गदर की ज्वाला।
सुलग रही हूँ बस एक फूंक से जल जाउंगी।।

जहाँ में रंज है गम है तो खुमारी भी है यारो।
मिला लो हाथ जो मुझसे तो संवर जाउंगी।।

दबी दबी सी खुश्बू फैलने को आतुर है देखो।
रंजो गम दिल से मिटा दो तो नजर आउंगी।।

दिव्या पाण्डेय (ऋतू)
26-10-2016

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2016

हा मिलता है

दिल वो फूल है जो टूटकर ही खिलता है
इसकी खूशबू से फिर आंसू भी मिलता है।।

जख्म के कांटे हैं जहां जिस्म के पर्दे तले
वहीं रूह को जीने का माहौल भी मिलता है।।

कभी हुस्न से फासला बनाकर देखो
कुछ तजरबा जुदाई के पलों में भी मिलता है।।

शबे-तन्हाई में ऐ दिल बेबस ना हो
सब्र कर, मंजिल जरा देर से भी मिलता है।।

नही आया

मुझे अश्कों की मोती दिखाना भी नही आया।
छुपाना था जिसे सबसे छुपाना भी नही आया।।

शबे गम को कभी फुर्सत में कहना था मगर।
मेरे हालात से मुझको ही मुकरना भी नही आया।।

मै हूँ एक फूल सी नाजुक मुझे काटों ने घेरा है।
मगर अफ़सोस है मुझको बिखरना भी नही आया।।

तेरे राहों पे चलने की ख्वाहिश थी बहुत मुझको।
मगर गम है की कांटो कोही सिमटना भी नही आया।।

कभी सुख की पुरवाई गमो को दूर ले भागी।
ख़ुशी के अश्क आँखों से गिराना भी नही आया।।

नही आया

मुझे अश्कों की मोती दिखाना भी नही आया।
छुपाना था जिसे सबसे छुपाना भी नही आया।।

शबे गम को कभी फुर्सत में कहना था मगर।
मेरे हालात से मुझको ही मुकरना भी नही आया।।

मै हूँ एक फूल सी नाजुक मुझे काटों ने घेरा है।
मगर अफ़सोस है मुझको बिखरना भी नही आया।।

तेरे राहों पे चलने की ख्वाहिश थी बहुत मुझको।
मगर गम है की कांटो कोही सिमटना भी नही आया।।

कभी सुख की पुरवाई गमो को दूर ले भागी।
ख़ुशी के अश्क आँखों से गिराना भी नही आया।।

बुधवार, 12 अक्टूबर 2016

मौका देती है जिंदगी

मची है एक हलचल सी
कुछ करने की,
मौके पे मौका देती जिंदगी ,
कितने को संभाला
कितना गवांया ,
जो खोया सो गया
मौका देती जिंदगी,
पर समय कहता
कुछ और ,
ध्यान रख…
मौका देती जिंदगी
पर मै जिंदगी नहीं
मै तो तेरा
समय हूँ
एक बार गया ..
तो वापस  नहीं आऊंगा…
पहल कर
वरना जिंदगी भी
थक कर मौके न देगी
पहल कर तू पहल कर !
इसी विचार के साथ शुभ रात्री

हा मिलता है

दिल वो फूल है जो टूटकर ही खिलता है
इसकी खूशबू से फिर आंसू भी मिलता है।।

जख्म के कांटे हैं जहां जिस्म के पर्दे तले
वहीं रूह को जीने का माहौल भी मिलता है।।

कभी हुस्न से फासला बनाकर देखो
कुछ तजरबा जुदाई के पलों में भी मिलता है।।

शबे-तन्हाई में ऐ दिल बेबस ना हो
सब्र कर, मंजिल जरा देर से भी मिलता है।।

मंगलवार, 4 अक्टूबर 2016

सोने दे

वर्षो से तरसे है सुकून ए नींद की खातिर
अब हिज्र की रात है जरा चैन से सोने दे।।

कब से चाहा था कभी सुकून मिले हमको।
ख़ुशी की घड़ी में कुछ मेरे दर्द को खोने दे।।

क्या मालूम  कब जिंदगी की शाम हो जाए।
लगजा सीने से मेरे हर दर्द को तो रोलेने दे।।

कवायतें रियायतें बहुत देखे है सुने है मैंने।
मानूँगी तेरे हर एहसान जरा वक्त तो होने दे।।

उजाले फ़क़त चैनके खातिर चुना था तुझको।
दुवा का दौर अभी कहाँ?जरा शाम तो होने दे।।

दिव्यापाण्डेय ऋतू
05-09-2016

सोमवार, 3 अक्टूबर 2016

अवसाद

हा सच अवसाद में है जिंदगी
रिस्तो के फसाद में है जिंदगी।।

बहुत कश्मोकश में है हम तो
जाने क्या तलाश में है जिंदगी।।

टूट कर बिखरी है उम्मीदें सारी
लेकिन किस आस में है जिंदगी।।

बहुत टूटी हूँ रवायतों के चलते
अब मौत की तलाश में है जिंदगी।।

#बेवजह

रविवार, 2 अक्टूबर 2016

रूह तंग है

जीवन और मृत्यु
दो ही सत्य है
जीवन का अनुभव कड़वा सा
तीखा सा जहर सा
निकला।
उलझन प्रतिकार सब
बन गए जीवन का
आधार।
मोह माया में क्या रखा है
क्या अपना है
किराए की जिंदगी
किराए का घर
किराए के लोग
कठपुतली सी हो गयी जिंदगी
डोर घुमाने वाला
अब इंसान नही
घर में जो बसता था
अब वो भगवान् नही
तिरस्कार से तंग
जिंदगी बन गयी जंग।।
अब मौत आ
तुझे गले लगा लूँ
तेरे संग गा लूँ
तुझसे लिपट ले
तेरे संग चलना है
रूह को अब चैन नही
किराए की काया में
छीन लो ना साँसे मेरी
क्या रखा है माया में।।

#बेवजह

गुरुवार, 29 सितंबर 2016

मुझे आज खुद को गढ़ना पड़ेगा

खुद को लिखूँ खुद को पढूँ
कलम चाहती है नया कुछ गढ़ूं
विचारों की शक्ति धूमिल सी है
मन कुछ कुछ बोझिल सी है।।

नई चेतना मन को आतुर करे है
पुरवायियों में रंग से भरे है
नया दिन निकलने को व्याकुल खड़ा है
मगर रास्ता भी लम्बा बड़ा है।।

कही धूप है तो कही छाँव भी है
शहर में भटकती रूह की गाँव भी है
वहाँ चैन जन्नत की मिलती बहुत है
मगर रिश्तो में मिलावट बहुत है।।

कोई आज में जीता है कोई कल को रोता है
कोई खोकर पाता है कोई पाकर खोता है
रोने की सबको है आदत पुरानी
यही बात सदियों से बनती कहानी।।

मुझे आज खुद को पढ़ना पड़ेगा
कोई राह मुझको भी गढ़ना पड़ेगा
छोड़ किस्से कहानी की बातो को अब तो
एक नया धुन से आगे बढ़ना पड़ेगा।।

#सच_है_की_हम_बदलेंगे_युग_बदलेगा

शुभरात्री

रविवार, 11 सितंबर 2016

प्रश्न

दिन के उजास में
या शाम की गहराई में
लोगो की भीड़ में
या गजब की तन्हाई में
दिल ढूँढता फिरता है
मेरा अक्स किधर है
जो मुझको चला रहा है
वो सख्श किधर है.....
मुझमेँ अगर मै हूँ
तो मै ऐसी क्यों हूँ
मुझमेँ अगर तू है
तो तू दीखता क्यों नही
मोल है मेरा बेमोल तू है
तो बिकती सिर्फ मै क्यों
तू बिकता क्यों नही....
प्रश्न उठता है जेहन में
जवाब भी मिलना चाहिए
जिंदगी में वक्त का हिसाब
भी मिलना चाहिए....
यूँ तो अजनबी राहें भी
मेरे साथ साथ चलती है
शायद इसी लिए हर
ख्वाहिशे पिघलती है....
दुनियां फरेब है या
नजरों का धोखा है
चल जी ले जिंदगी
तुझे किसने रोका है..
मै मुझमे नही तू
तुझमें नही..
पर सच तो यही है
तू अक्स है मेरा
और मै परछाई हु तेरी...

दिव्या पाण्डेय ऋतू
10-09-2016

बुधवार, 7 सितंबर 2016

मन की बात

जब कोई दर्द गहराता है
तो गजल बनती है
अश्क पलकों में थम जाता है
तो गजल बनती है
नावजिशो का दौर तो
चलता ही रहता है
लेकिन जब कोई बातो से
चोट खाता है तो
गजल बनती है
चंद दर्द के टुकड़े
पैमाने में मिला के पी लूँ अगर
नशा हो जाए
नशा जब दर्द से टकराता है
तो गजल बनती है।
मुस्कुराहट की झुरमुट से
झाक कर देखो
साँस जब काटों से छन के
आये जाए
दिल में एक तड़प से उठे लेकिन
वक्त मरहम लगाता है
तो गजल बनती है।
#शुभ_दिवस_मित्रों

गुरुवार, 31 मार्च 2016

मैं खुद से हारी हूँ

शायद अपने ही कथन के बिपरीत
चल रही है जिंदगी
शायद इसीलिए पल पल बदल
रही है जिंदगी
सोचा था आकाश के तारे तोड़कर
रोशन कर दूँगी
अपने बच्चों का दामन खुशियों से
भर दूँगी
शायद नाकाम हूँ मैं सिर्फ परेशानियों
का नाम हूँ।
शायद इसीलिए आज खुद से हारी हूँ
अब पता चला मैं एक नासूर सी बिमारी हूँ
दुनियां के सवालो से डर लगता है
कौन हूँ मैं ये तक भूल जाने का मन करता है,
तुम परछाई हो मेरी मेरे जीवन का तार हो
कुछ हो जाता तो क्या होता
मेरा वजूद खुद अपना मूल्य खोता
कभी कभी बस ये ही सोच कर
रो जाने का मन करता है,
दुनिया की इस भीड़ में बस खो जाने
का मन करता है...

शुक्रवार, 4 मार्च 2016

तुम

तुम अटल हो
सत्य हो
सौभाग्य हो
तुम स्नेह से पूरित
मेरे विचारो की अभिव्यक्ति हो
मेरे हृदय में उपजी आशाओ
का तुम एक साकार रूप हो
मुझपर लगे प्रश्नचिन्हों
का विराम हो....
अतीत के काली अंधियारी
रातों के काले बादल को
चीर कर जब तुमने मुझे
नया सबेरा दिया
यकीन मानों मेरे आँखों
से ख़ुशी की जो लहर आई
उनसे धूल गयी
जीवन पर लगे वो सारे काले
धब्बे सच..
मैं फिर से बढ़ रही हूँ
सौभाग्य ख़ुशी इच्छावों
आशाओं और उम्मीदों
की चादर समेटे
अपने भविष्य की तरफ
धीरे धीरे हौले हौले..
बस एक दुवा करना तुम
सिर्फ मेरे लिए
की मेरी हर दुवा में तुम
रहना .
इस जनम,उस जनम,हर जनम
और जनम जनम..

शनिवार, 13 फ़रवरी 2016

गज़ल

एक सवाल ने कई जवाब बदल दिए।
बेशक जिंदगी ने हालात बदल दिए।।

जर्रे जर्रे से आती वफ़ावो की महक।
जबसे मैंने अपने एहसास बदल दिए।।

दर्द भी कोरा नही था वक्त ने जो दिए।
होठों के जब्त मैंने हर बात बदल दिए।।

अधूरी  जिंदगी अब पूरी सी लगने लगी।
जीने के हमने अपने अंदाज बदल दिए।।

कोई क्या कहेगा सोचूँ भी तो क्यों मैं?
खुदा ने खुदाई और कायनात बदल दिए।।