काश इतना समझ हुए होते,
कि रिश्तों की धूल झाड़कर,
हम असल चेहरों को पहचान पाते,
नक़ाबों की भीड़ में खुद को खोने से बचा पाते।
काश इतना समझ हुए होते,
कि रोशनियों की चाह में
अपने सूरज से मुँह न मोड़ते,
चाँद की ठंडी चांदनी में
अपने अस्तित्व को जला न डालते।
काश इतना समझ हुए होते,
कि खामोशी की जुबान को सुन पाते,
टूटते दिलों के शोर को पहचान पाते,
किसी के मुस्कुराने के पीछे
छिपे आँसू की बारिश को देख पाते।
काश इतना समझ हुए होते,
कि हर जीत असल में जीत नहीं होती,
और हर हार में छिपा होता
एक अनमोल सबक—
एक नया सफर, एक नई शक्ल होती।
काश इतना समझ हुए होते,
कि हम उन हाथों को थामते
जो बिना शर्त साथ निभाते,
न कि उन हाथों से उलझते
जो मतलबी वक़्तों में मुस्कुराते।
काश इतना समझ हुए होते,
कि भीड़ का हिस्सा बनकर
अपने अलग होने की सोच न खोते,
ज़िन्दगी की किताब में
बस पन्ने पलटना ही नहीं—
लिखना भी आता हमें थोड़े।
काश इतना समझ हुए होते,
कि “माफ़ी” देने में कमज़ोरी नहीं,
बल्कि हिम्मत की ऊँची उड़ान होती,
और “धन्यवाद” कह देना
दिल का सबसे बड़ा एहसान होता।
काश इतना समझ हुए होते,
कि जाने वालों के पीछे भागना
किसी भी आने वाले के अधिकार का
क़त्ल होता है—
और खुद को गिरवी रख देना
सबसे सस्ती सौदेबाज़ी होती है।
काश इतना समझ हुए होते,
कि अपना होना
सबसे बड़ी राहत है,
अपने सपनों को बचाए रखना
सबसे बड़ी जीत है,
और अपनी ख़ुशी को चुन लेना
सबसे बड़ा सच है।
काश…
इतना समझ हुए होते,
तो हर ग़लत मोड़ की थकान में भी
हम अपने भीतर छिपी
उस रोशनी को पहचान लेते—
जो कहती रहती है…
“तुम ख़ुद काफी हो,
और यही तुम्हारी सबसे बड़ी समझ है।”
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