गुरुवार, 27 नवंबर 2025

जन्नत की दहलीज पर खड़ी इंसानियत

किसके लिए जन्नत बनाई ऐ खुदा,
जब हर रूह किसी न किसी कसक से दाग़दार है।
यहाँ कौन है जो कतरे-बर-कतरा टूटा नहीं,
कौन है जो अपनी गलतियों पर शर्मसार नहीं?

कभी हालात ने पाप बनकर धकेला,
कभी मजबूरी ने फैसलों को चुप करा दिया।
कभी हमने जीने के लिए झूठ कहा,
कभी किसी अपने को बचाने के लिए सच छुपा दिया।

अंधेरों में कोई पनाह मांगता है,
तो उजालों में कोई जलता हुआ नज़र आता है।
हर मुस्कान के पीछे एक टूटा हुआ किस्सा है,
हर भले चेहरे के भीतर नक़ाब-सा सच छिपा हुआ नज़र आता है।

तूने जन्नत फरिश्तों के लिए बनाई होगी,
पर धरती पर तूने तो इंसान उतारे हैं।
अगर उन्हें बेगुनाह ही रखना था,
तो फिर दिल में मोहब्बत और दर्द क्यों उतारे हैं?

गुनाह सिर्फ़ खंजर चलाने से नहीं होते,
कभी चुप रहना भी पाप बन जाता है।
कभी पूरी दुनिया बच जाती है एक झूठ से,
और कभी एक सच पूरे रिश्‍ते को मिटा जाता है।

अगर हिसाब चाहिए तेरे ताराज़ू को, तो सुन —
किसी ने वक्त की मार में चोरी की,
किसी ने दो वक्त की रोटी के लिए अरदास में कटोरी ली,
किसी ने मोहब्बत के नाम पर धोखा किया,
और किसी ने धोखा सहकर भी मोहब्बत छोड़ी नहीं।

कौन है पाक, कौन है पाप?
फैसला इतना आसान नहीं ऐ मालिक —
दुनिया गलती करने वालों से भरी है,
पर माफी मांगने वालों से रौशन भी तो है।

अगर जन्नत सिर्फ़ वो पाएंगे
जिन्होंने कभी गुनाह को छुआ भी नहीं,
तो फिर इस दुनिया में कोई भी
तेरी रहमत के काबिल बचेगा ही नहीं।

इसलिए —
जन्नत उसको देना जिसने गिरकर भी उठना सीखा,
जिसने दर्द सहकर भी दुआ देना सीखा,
जिसने टूटकर भी किसी के दिल को तोड़ना नहीं सीखा,
जिसने दुनिया की कठोरता के बावजूद इंसान बने रहना सीखा।

अगर जन्नत तेरी इनायत है,
तो उसे इनायत की तरह ही देना —
इनाम की तरह नहीं।

क्योंकि जन्नत उस दिन सबसे खूबसूरत लगेगी,
जब उसकी रौशनी में
गुनाह नहीं —
पश्चाताप का उजाला चमक रहा होगा।

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