कभी आसमान में नहीं मिलता,
न मंदिर की घंटियों में,
न पवित्र पुस्तकों की पंक्तियों में—
वो तो मेरी धड़कनों के बीच
अनसुना-सा बैठा रहता है।
लोग कहते हैं —
ईश्वर कहीं दूर पर्वतों पर है,
पर मैं जानती हूँ—
वो मेरे भीतर चुपचाप
एक दीपक की लौ की तरह जलता है,
जिसकी रौशनी में
मैं खुद को देखना सीख रही हूँ।
जब दुनिया मुझे तोड़ने में लग जाती है,
और हिम्मत मेरे कदमों से छूट जाती है,
तब मेरे सीने में एक आवाज उठती है—
“हिम्मत रख,
मैं तेरे साथ हूँ।”
वो आवाज…
कोई और नहीं—
मेरा ईश्वर है।
वो मेरे आँसुओं के किनारे बैठा
मेरी चुप्पियों को तसल्ली देता है।
मैं रुकूँ तो वो कदमों में हवा बनकर
मुझे फिर आगे बढ़ाता है।
वो श्रद्धा से नहीं आता,
वो विश्वास से जागता है।
मेरा ईश्वर
झुककर प्रणाम लेने वाला नहीं,
सीधी रीढ़ बनकर
किसी के आगे न झुकने की ताकत है।
मैंने उसे पहचाना—
जब किसी ने मुझे गलत कहा
और वो भीतर से बोला—
“तू ही तेरी सही परिभाषा है।”
वो मेरे भीतर बैठा
मेरे हर डर को पानी करता है,
और मेरे सपनों को
पंख उगाकर उड़ने देता है।
कभी वो माँ की तरह
मेरे माथे पर हाथ रखता है,
कभी दोस्त बनकर कहता है—
“चल दिव्या,
जिंदगी अभी ख़त्म कहाँ हुई!”
वो कोई मूर्ति नहीं—
जो टूट जाए।
वो कोई किताब नहीं—
जो बंद हो जाए।
वो मेरे आत्म-सम्मान का मंदिर है—
जिसके दरवाज़े
मैंने अब हमेशा के लिए खोल दिए हैं।
जब मैं खुद से प्यार करती हूँ—
वो खिलखिला कर आशीर्वाद देता है।
जब मैं खुद से नाराज़ होती हूँ—
वो मेरे ग़ुस्से में भी
अपनी दया का हाथ रख देता है।
मेरा ईश्वर
मुझसे अलग नहीं—
मेरे हर सांस में शामिल है।
मैं गिरूँ तो वो मेरा सहारा,
मैं थक जाऊँ तो वो मेरा बसेरा।
और सबसे सुंदर बात—
उसका ठिकाना न आसमान है
न किसी क्षितिज के उस पार—
वो यहीं है…
मेरे सीने में,
मेरे शब्दों में,
मेरी मुस्कान में,
मेरे निर्णयों में—
मुझमें
हाँ…
मेरा ईश्वर
मुझे मेरे भीतर ही दिखता है—
और जब भी मैं खुद को देखती हूँ,
मुझे वह दिख जाता है।
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