दिव्या, तुम क्या चाहती हो?
क्योंकि हर बार सवाल दुनिया का होता है,
और जवाब मेरे भीतर कहीं दबा रह जाता है,
ठीक वहीं… जहां सपनों की राख गर्म रहती है।
मैं चाहती हूँ —
एक ऐसा क्षण, जहाँ सवालों के बदले एहसास हो,
जहाँ कोई मेरे उत्तर आने तक ठहरे,
और मेरा मौन भी सुना जाए —
जैसे शब्दों का भी एक धर्म होता है।
मैं चाहती हूँ —
भीड़ में एक जगह नहीं,
भीड़ के पार एक पहचान।
जहाँ लोग मेरा नाम सिर्फ पुकारें नहीं,
बल्कि समझें।
मैं चाहती हूँ —
लड़ाई से जीता हुआ सम्मान नहीं,
बल्कि समझ से मिली हुई जगह।
जहाँ मेरी दृढ़ता तलवार नहीं,
एक फूल की तरह खिलती नज़र आए।
मैं यह भी चाहती हूँ —
कि कोई मेरे थके हुए कंधों को देखे,
और कहे —
“दिव्या, कुछ पल दुनिया तुम्हें ढोने दे।”
क्योंकि मजबूत होना मेरी आदत है,
ज़रूरत नहीं।
मैं चाहती हूँ —
कि मेरी हँसी पर शक न हो,
मेरी चुप्पी पर पहरे न हों,
मेरे सपनों पर उधार के फैसले न हों,
और मेरी भावनाओं पर अदालत न बैठे।
मैं चाहती हूँ —
ऐसा प्यार जो मुझ पर दावा न करे,
मुझे सिर्फ महसूस करे।
जो भाग्य की रेखाओं में नहीं,
मेरी आँखों की चमक में अपना घर बनाए।
और अगर तुम सच में पूछो —
तो मैं चाहती हूँ सिर्फ इतना —
कि जिंदगी मेरी हो,
और मैं खुद को बिना किसी मापदंड के
पूरी तरह जी सकूँ।
बस…
कभी पूछो तो —
दिव्या, तुम खुश कब होती हो?
तुम थकती कब हो?
तुम टूटती क्यों नहीं?
और तुम मुस्कुराना कहा से सीखती हो?
सवाल बदल जाएंगे तो
शायद दुनिया भी बदल जाएगी।
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