सोमवार, 15 मई 2017

Ptita

जिंदगी की रफ़्तार कोई नही समझ पाता कब और कैसे रास्ते से मुड़ जाए और निर्वाध गति से बढ़ती चली जाए शायद भाग्य की ही बिडम्बना कही जा सकती है मैंने देखा है उसे बचपन से लेकर जवानी तक, बचपन में खिलौनों के बीच खेलती हुयी मासूम सी लड़की ।सुख साधन का कोई अभाव न था प्यार सम्मान में कोई कमी न थी पढ़ाई लिखाई में अब्बल थी।देखते ही देखते मेरी आँखो के सामने बड़ी हुयी अब उसके ब्याह की चिंता, माँ बाऊजी दिन रात अच्छे रिश्ते की खोज में लग गए। एक दिन पता चलता है की उस गुड़िया का ब्याह भी तय हो गया नियत समय पर ब्याह हुवा और अपने ससुराल चली गयी। मै तो पडोसी ठहरी पर उसे देखकर खुश होना मेरी आदत में बस गयी थी।उसके जाने के बाद कई दिनों तक उसकी कमी मुझे खलती।पर बेटी थी ससुराल तो जाना था यही सोचकर दिल को तसल्ली दे दी।
  दिन महीने साल गुजर गए उसे नही देखा धीरे धीरे उसकी यादें भी धुंधली होने लगी तभी एक दिन वो दिखती है बिछिप्त सी एक बच्ची की ऊँगली पकड़े और एक बच्चा पेट में लिए हुए।
बाल उलझे से साड़ी अस्तव्यस्त रोती हुयी आते हुए। अभी अपने मायके की चौखट पर ही पहुची थी की मुझसे रहा नही गया मै दौड़ गयी उसके घर के लिए। और उसे बाँहो में भर लिया पूछ बैठी बिटिया क्या हुवा कैसा हाल बना रखा है बता मुझे।
     उसका तो गला ही सुख गया था हलक से दो शब्द भी ना निकल पाये बस रोती रही। तभी मैंने उसकी माँ को आवाज दिया- बहन जी देखो गुड़िया आई है। माँ बाहर आई साथ में पिता भाई और भाभी भी।माँ ने आते ही कहा क्या गुड़िया मैंने कहा था ना की कोई गलत कदम मत उठाना। अभी अभी जमाई बाबू का फोन आया था की आपकी बेटी चली गयी आपके यहाँ अब चली गयी तो उसे कभी यहाँ मत भेजना। बोल अब क्या तू मायके में ही जीवन भर रहेगी। तू अकेली होती तो भी ठीक ये तेरी जिम्मेदारियो को कौन संभालेगा। तेरे बाबूजी भी रिटायर हो गए है तू तो बोझ बन के आ गयी।
     उनकी बाते सुनकर मै स्तब्ध सी रह गयी कुछ सोचने लगी।फिर बोली बहन जी गुड़िया पेट से है इसे सहारा तो देना ही पड़ेगा।अगर आपको कोई परेशानी ना हो तो इसे मेरे साथ भेज दो भगवान् ने मुझे औलाद सुख नही दिया कुछ दिन मै भी माँ बन के इसकी देखभाल कर लूँ बच्चा होने के बाद इसके ससुराल वालो से बात कर लेंगे। मुझे बड़ा आश्चर्य हुवा की उसकी माँ ने बिना किसी टाल मटोल के गुड़िया को मेरे साथ दरवाजे से ही भेज दिया। लेकिन मै समझ सकती थी उसे क्या महसूस हो रहा था।
    समय बीतता गया ससुराल से आने के ठीक बीस दिन बाद गुड़िया ने एक बहुत ही सुंदर बेटे को जन्म दिया ये खबर मैंने जब गुड़िया के माँ के पास भेजी तो उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नही दी और ना ही बेटी और नाती को देखने की इच्छा जताई।मै बोझिल मन से वापस आ गयी।गुड़िया ने भी कुछ नही पूछा मानो उसे सब पता हो। उसकी आँखो से आँसू गिर रहे थे। मैंने उसे सीने से लगाया और कहाँ- की शायद मुझे भगवान् ने इसी लिए बेऔलाद रखा था क्योंकि तू मेरी किस्मत में थी। खैर गुड़िया अब सम्भल गयी थी और मुझे माँ कहने लगी।
  नवंबर का महीना था तबतक बच्चा डेढ़ महीने का हो गया था हम धुप में बच्चे को लेकर बैठे थे तभी गुड़िया ने कहाँ-माँ एक बार मेरे पति से बात कर लो क्या पता बेटे के बारे में जानकर उनका गुस्सा गायब हो जाए और वो हमे अपना ले।मैंने कहाँ ठीक तू फोन लेकर आ मै अभी बात करती हूँ। वो अंदर से फोन लेकर आई तो मैंने नम्बर पूछकर मिलाया जमाई बाबू ने ही फोन रिसीव किया थोड़ी सी औपचारिकता के बाद मैंने उन्हें गुड़िया और उसके बेटे के बारे में बताया की अचानक फोन कट हो गया। मुझे लगा की नेटवर्क की वजह से फोन कट गया। मैंने फिर से फोन मिलाया पर फोन नही उठा। मै बार बार फोन मिलाती रही की अचानक फोन किसी महिला ने उठा लिया मैंने कहा की संजय जी(जमाई बाबू का नाम) से बात कराओ तो उसने कहा की मै संजय की बीबी बोल रही हूँ आप बताईये क्या बात है मै उन्हें बता दूँगी। ये सुनते ही मेरे हाथ से फोन छूट गया और मेरा शरीर बुरी तरह काँपने लगा। मै समझ नही पा रही थी  की क्या कहूँ। गुड़िया ने मुझे देखा तो परेशान होक पूछने लगी माँ बताओ ना क्या हुवा? बेबस सी मै बस इतना ही कह पायी----ये कर्म क्षेत्र है आगे बढ़!!
   वो समझ गयी की कुछ गलत हुवा है पर क्या ये नही पूछा बस बोली माँ मै भी पतिता हो गयी। और रोती हुयी अपने कमरे में चली गयी। मैंने उसे बहुत समझाया शायद वो समझ भी गयी तभी उसने अपने मांग का सिंदूर पैरो की बिछुवा गले का मंगलसूत्र और हाथो की चूड़िया निकाल फेकी। उसका ये रूप देखकर मै सदमे में थी की तभी वो बोली--माँ मै पतिता नही ये कर्म क्षेत्र है मेरा साथ दो मै आगे बढ़ना चाहती हूँ मुझे आशीर्वाद दो।
  सच मानिए मेरी ख़ुशी का कोई ठिकाना ही नही रहा मै तुरन्त अंदर गयी और आलमारी में से कुछ पैसे निकाल कर उसे दे दी बोली--बेटा तू अपना सफर तय कर मै तेरे साथ हूँ। गुड़िया ने अगले दिन ही जाकर बीएड का फॉर्म भरा और मेहनत से पढ़ने लगी उसने 85 %मार्क से बीएड क़्वालीफाई किया। गुड़िया के पंख निकल आये है अब उड़ान भरने की देरी है। उसे देखकर यही लगता है की---
मुश्किलें किसी को तोड़ती नही बल्कि हौसला देती है की वो अपने कर्म क्षेत्र में आगे बढ़ सके जरूरत है समाज को जागरूक करने का की वो किसी को रास्ता दिखाकर उसका सम्बल बने।।
         #धन्यवाद 
डॉ दिव्या पाण्डेय 
गोला बाजार गोरखपुर
उत्तर प्रदेश

Ptita

जिंदगी की रफ़्तार कोई नही समझ पाता कब और कैसे रास्ते से मुड़ जाए और निर्वाध गति से बढ़ती चली जाए शायद भाग्य की ही बिडम्बना कही जा सकती है मैंने देखा है उसे बचपन से लेकर जवानी तक, बचपन में खिलौनों के बीच खेलती हुयी मासूम सी लड़की ।सुख साधन का कोई अभाव न था प्यार सम्मान में कोई कमी न थी पढ़ाई लिखाई में अब्बल थी।देखते ही देखते मेरी आँखो के सामने बड़ी हुयी अब उसके ब्याह की चिंता, माँ बाऊजी दिन रात अच्छे रिश्ते की खोज में लग गए। एक दिन पता चलता है की उस गुड़िया का ब्याह भी तय हो गया नियत समय पर ब्याह हुवा और अपने ससुराल चली गयी। मै तो पडोसी ठहरी पर उसे देखकर खुश होना मेरी आदत में बस गयी थी।उसके जाने के बाद कई दिनों तक उसकी कमी मुझे खलती।पर बेटी थी ससुराल तो जाना था यही सोचकर दिल को तसल्ली दे दी।
  दिन महीने साल गुजर गए उसे नही देखा धीरे धीरे उसकी यादें भी धुंधली होने लगी तभी एक दिन वो दिखती है बिछिप्त सी एक बच्ची की ऊँगली पकड़े और एक बच्चा पेट में लिए हुए।
बाल उलझे से साड़ी अस्तव्यस्त रोती हुयी आते हुए। अभी अपने मायके की चौखट पर ही पहुची थी की मुझसे रहा नही गया मै दौड़ गयी उसके घर के लिए। और उसे बाँहो में भर लिया पूछ बैठी बिटिया क्या हुवा कैसा हाल बना रखा है बता मुझे।
     उसका तो गला ही सुख गया था हलक से दो शब्द भी ना निकल पाये बस रोती रही। तभी मैंने उसकी माँ को आवाज दिया- बहन जी देखो गुड़िया आई है। माँ बाहर आई साथ में पिता भाई और भाभी भी।माँ ने आते ही कहा क्या गुड़िया मैंने कहा था ना की कोई गलत कदम मत उठाना। अभी अभी जमाई बाबू का फोन आया था की आपकी बेटी चली गयी आपके यहाँ अब चली गयी तो उसे कभी यहाँ मत भेजना। बोल अब क्या तू मायके में ही जीवन भर रहेगी। तू अकेली होती तो भी ठीक ये तेरी जिम्मेदारियो को कौन संभालेगा। तेरे बाबूजी भी रिटायर हो गए है तू तो बोझ बन के आ गयी।
     उनकी बाते सुनकर मै स्तब्ध सी रह गयी कुछ सोचने लगी।फिर बोली बहन जी गुड़िया पेट से है इसे सहारा तो देना ही पड़ेगा।अगर आपको कोई परेशानी ना हो तो इसे मेरे साथ भेज दो भगवान् ने मुझे औलाद सुख नही दिया कुछ दिन मै भी माँ बन के इसकी देखभाल कर लूँ बच्चा होने के बाद इसके ससुराल वालो से बात कर लेंगे। मुझे बड़ा आश्चर्य हुवा की उसकी माँ ने बिना किसी टाल मटोल के गुड़िया को मेरे साथ दरवाजे से ही भेज दिया। लेकिन मै समझ सकती थी उसे क्या महसूस हो रहा था।
    समय बीतता गया ससुराल से आने के ठीक बीस दिन बाद गुड़िया ने एक बहुत ही सुंदर बेटे को जन्म दिया ये खबर मैंने जब गुड़िया के माँ के पास भेजी तो उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नही दी और ना ही बेटी और नाती को देखने की इच्छा जताई।मै बोझिल मन से वापस आ गयी।गुड़िया ने भी कुछ नही पूछा मानो उसे सब पता हो। उसकी आँखो से आँसू गिर रहे थे। मैंने उसे सीने से लगाया और कहाँ- की शायद मुझे भगवान् ने इसी लिए बेऔलाद रखा था क्योंकि तू मेरी किस्मत में थी। खैर गुड़िया अब सम्भल गयी थी और मुझे माँ कहने लगी।
  नवंबर का महीना था तबतक बच्चा डेढ़ महीने का हो गया था हम धुप में बच्चे को लेकर बैठे थे तभी गुड़िया ने कहाँ-माँ एक बार मेरे पति से बात कर लो क्या पता बेटे के बारे में जानकर उनका गुस्सा गायब हो जाए और वो हमे अपना ले।मैंने कहाँ ठीक तू फोन लेकर आ मै अभी बात करती हूँ। वो अंदर से फोन लेकर आई तो मैंने नम्बर पूछकर मिलाया जमाई बाबू ने ही फोन रिसीव किया थोड़ी सी औपचारिकता के बाद मैंने उन्हें गुड़िया और उसके बेटे के बारे में बताया की अचानक फोन कट हो गया। मुझे लगा की नेटवर्क की वजह से फोन कट गया। मैंने फिर से फोन मिलाया पर फोन नही उठा। मै बार बार फोन मिलाती रही की अचानक फोन किसी महिला ने उठा लिया मैंने कहा की संजय जी(जमाई बाबू का नाम) से बात कराओ तो उसने कहा की मै संजय की बीबी बोल रही हूँ आप बताईये क्या बात है मै उन्हें बता दूँगी। ये सुनते ही मेरे हाथ से फोन छूट गया और मेरा शरीर बुरी तरह काँपने लगा। मै समझ नही पा रही थी  की क्या कहूँ। गुड़िया ने मुझे देखा तो परेशान होक पूछने लगी माँ बताओ ना क्या हुवा? बेबस सी मै बस इतना ही कह पायी----ये कर्म क्षेत्र है आगे बढ़!!
   वो समझ गयी की कुछ गलत हुवा है पर क्या ये नही पूछा बस बोली माँ मै भी पतिता हो गयी। और रोती हुयी अपने कमरे में चली गयी। मैंने उसे बहुत समझाया शायद वो समझ भी गयी तभी उसने अपने मांग का सिंदूर पैरो की बिछुवा गले का मंगलसूत्र और हाथो की चूड़िया निकाल फेकी। उसका ये रूप देखकर मै सदमे में थी की तभी वो बोली--माँ मै पतिता नही ये कर्म क्षेत्र है मेरा साथ दो मै आगे बढ़ना चाहती हूँ मुझे आशीर्वाद दो।
  सच मानिए मेरी ख़ुशी का कोई ठिकाना ही नही रहा मै तुरन्त अंदर गयी और आलमारी में से कुछ पैसे निकाल कर उसे दे दी बोली--बेटा तू अपना सफर तय कर मै तेरे साथ हूँ। गुड़िया ने अगले दिन ही जाकर बीएड का फॉर्म भरा और मेहनत से पढ़ने लगी उसने 85 %मार्क से बीएड क़्वालीफाई किया। गुड़िया के पंख निकल आये है अब उड़ान भरने की देरी है। उसे देखकर यही लगता है की---
मुश्किलें किसी को तोड़ती नही बल्कि हौसला देती है की वो अपने कर्म क्षेत्र में आगे बढ़ सके जरूरत है समाज को जागरूक करने का की वो किसी को रास्ता दिखाकर उसका सम्बल बने।।
         #धन्यवाद 
डॉ दिव्या पाण्डेय 
गोला बाजार गोरखपुर
उत्तर प्रदेश

Ptita

जिंदगी की रफ़्तार कोई नही समझ पाता कब और कैसे रास्ते से मुड़ जाए और निर्वाध गति से बढ़ती चली जाए शायद भाग्य की ही बिडम्बना कही जा सकती है मैंने देखा है उसे बचपन से लेकर जवानी तक, बचपन में खिलौनों के बीच खेलती हुयी मासूम सी लड़की ।सुख साधन का कोई अभाव न था प्यार सम्मान में कोई कमी न थी पढ़ाई लिखाई में अब्बल थी।देखते ही देखते मेरी आँखो के सामने बड़ी हुयी अब उसके ब्याह की चिंता, माँ बाऊजी दिन रात अच्छे रिश्ते की खोज में लग गए। एक दिन पता चलता है की उस गुड़िया का ब्याह भी तय हो गया नियत समय पर ब्याह हुवा और अपने ससुराल चली गयी। मै तो पडोसी ठहरी पर उसे देखकर खुश होना मेरी आदत में बस गयी थी।उसके जाने के बाद कई दिनों तक उसकी कमी मुझे खलती।पर बेटी थी ससुराल तो जाना था यही सोचकर दिल को तसल्ली दे दी।
  दिन महीने साल गुजर गए उसे नही देखा धीरे धीरे उसकी यादें भी धुंधली होने लगी तभी एक दिन वो दिखती है बिछिप्त सी एक बच्ची की ऊँगली पकड़े और एक बच्चा पेट में लिए हुए।
बाल उलझे से साड़ी अस्तव्यस्त रोती हुयी आते हुए। अभी अपने मायके की चौखट पर ही पहुची थी की मुझसे रहा नही गया मै दौड़ गयी उसके घर के लिए। और उसे बाँहो में भर लिया पूछ बैठी बिटिया क्या हुवा कैसा हाल बना रखा है बता मुझे।
     उसका तो गला ही सुख गया था हलक से दो शब्द भी ना निकल पाये बस रोती रही। तभी मैंने उसकी माँ को आवाज दिया- बहन जी देखो गुड़िया आई है। माँ बाहर आई साथ में पिता भाई और भाभी भी।माँ ने आते ही कहा क्या गुड़िया मैंने कहा था ना की कोई गलत कदम मत उठाना। अभी अभी जमाई बाबू का फोन आया था की आपकी बेटी चली गयी आपके यहाँ अब चली गयी तो उसे कभी यहाँ मत भेजना। बोल अब क्या तू मायके में ही जीवन भर रहेगी। तू अकेली होती तो भी ठीक ये तेरी जिम्मेदारियो को कौन संभालेगा। तेरे बाबूजी भी रिटायर हो गए है तू तो बोझ बन के आ गयी।
     उनकी बाते सुनकर मै स्तब्ध सी रह गयी कुछ सोचने लगी।फिर बोली बहन जी गुड़िया पेट से है इसे सहारा तो देना ही पड़ेगा।अगर आपको कोई परेशानी ना हो तो इसे मेरे साथ भेज दो भगवान् ने मुझे औलाद सुख नही दिया कुछ दिन मै भी माँ बन के इसकी देखभाल कर लूँ बच्चा होने के बाद इसके ससुराल वालो से बात कर लेंगे। मुझे बड़ा आश्चर्य हुवा की उसकी माँ ने बिना किसी टाल मटोल के गुड़िया को मेरे साथ दरवाजे से ही भेज दिया। लेकिन मै समझ सकती थी उसे क्या महसूस हो रहा था।
    समय बीतता गया ससुराल से आने के ठीक बीस दिन बाद गुड़िया ने एक बहुत ही सुंदर बेटे को जन्म दिया ये खबर मैंने जब गुड़िया के माँ के पास भेजी तो उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नही दी और ना ही बेटी और नाती को देखने की इच्छा जताई।मै बोझिल मन से वापस आ गयी।गुड़िया ने भी कुछ नही पूछा मानो उसे सब पता हो। उसकी आँखो से आँसू गिर रहे थे। मैंने उसे सीने से लगाया और कहाँ- की शायद मुझे भगवान् ने इसी लिए बेऔलाद रखा था क्योंकि तू मेरी किस्मत में थी। खैर गुड़िया अब सम्भल गयी थी और मुझे माँ कहने लगी।
  नवंबर का महीना था तबतक बच्चा डेढ़ महीने का हो गया था हम धुप में बच्चे को लेकर बैठे थे तभी गुड़िया ने कहाँ-माँ एक बार मेरे पति से बात कर लो क्या पता बेटे के बारे में जानकर उनका गुस्सा गायब हो जाए और वो हमे अपना ले।मैंने कहाँ ठीक तू फोन लेकर आ मै अभी बात करती हूँ। वो अंदर से फोन लेकर आई तो मैंने नम्बर पूछकर मिलाया जमाई बाबू ने ही फोन रिसीव किया थोड़ी सी औपचारिकता के बाद मैंने उन्हें गुड़िया और उसके बेटे के बारे में बताया की अचानक फोन कट हो गया। मुझे लगा की नेटवर्क की वजह से फोन कट गया। मैंने फिर से फोन मिलाया पर फोन नही उठा। मै बार बार फोन मिलाती रही की अचानक फोन किसी महिला ने उठा लिया मैंने कहा की संजय जी(जमाई बाबू का नाम) से बात कराओ तो उसने कहा की मै संजय की बीबी बोल रही हूँ आप बताईये क्या बात है मै उन्हें बता दूँगी। ये सुनते ही मेरे हाथ से फोन छूट गया और मेरा शरीर बुरी तरह काँपने लगा। मै समझ नही पा रही थी  की क्या कहूँ। गुड़िया ने मुझे देखा तो परेशान होक पूछने लगी माँ बताओ ना क्या हुवा? बेबस सी मै बस इतना ही कह पायी----ये कर्म क्षेत्र है आगे बढ़!!
   वो समझ गयी की कुछ गलत हुवा है पर क्या ये नही पूछा बस बोली माँ मै भी पतिता हो गयी। और रोती हुयी अपने कमरे में चली गयी। मैंने उसे बहुत समझाया शायद वो समझ भी गयी तभी उसने अपने मांग का सिंदूर पैरो की बिछुवा गले का मंगलसूत्र और हाथो की चूड़िया निकाल फेकी। उसका ये रूप देखकर मै सदमे में थी की तभी वो बोली--माँ मै पतिता नही ये कर्म क्षेत्र है मेरा साथ दो मै आगे बढ़ना चाहती हूँ मुझे आशीर्वाद दो।
  सच मानिए मेरी ख़ुशी का कोई ठिकाना ही नही रहा मै तुरन्त अंदर गयी और आलमारी में से कुछ पैसे निकाल कर उसे दे दी बोली--बेटा तू अपना सफर तय कर मै तेरे साथ हूँ। गुड़िया ने अगले दिन ही जाकर बीएड का फॉर्म भरा और मेहनत से पढ़ने लगी उसने 85 %मार्क से बीएड क़्वालीफाई किया। गुड़िया के पंख निकल आये है अब उड़ान भरने की देरी है। उसे देखकर यही लगता है की---
मुश्किलें किसी को तोड़ती नही बल्कि हौसला देती है की वो अपने कर्म क्षेत्र में आगे बढ़ सके जरूरत है समाज को जागरूक करने का की वो किसी को रास्ता दिखाकर उसका सम्बल बने।।
         #धन्यवाद 
डॉ दिव्या पाण्डेय 
गोला बाजार गोरखपुर
उत्तर प्रदेश