रविवार, 16 नवंबर 2025

चरित्रहीन

पुरुष-प्रधान समाज की सबसे पुरानी और घटिया चाल यही रही है—स्त्री को चरित्रहीन कह दो।
क्योंकि जब सच से डर लगे, तर्क खत्म हो जाएं, और स्त्री अपनी रीढ़ सीधी कर ले—तो पुरुष समाज के पास बचता ही क्या है?
एक सड़ा हुआ आरोप।
एक सदियों पुराना हथियार।
और वही हथियार आज भी इस्तेमाल होता है, जैसे यह समाज अब तक मानसिक रूप से उसी अँधेरे गड्ढे में अटका हुआ है।

सच्चाई यह है कि स्त्री को चरित्रहीन घोषित करने की परंपरा दरअसल पुरुष-असुरक्षा का सबसे बड़ा सबूत है।
स्त्री अगर मुस्कुरा दे तो “चरित्रहीन”,
दफ्तरी बातचीत कर दे तो “चरित्रहीन”,
अपनी पसंद का कपड़ा पहन ले तो “चरित्रहीन”,
ना कह दे तो “चरित्रहीन”,
हाँ कह दे तो भी “चरित्रहीन”।

यह समाज यह भूल जाता है कि वात्सल्य, संवेदना, स्वतंत्रता, हक़ और इच्छाएँ रखना—चरित्रहीनता नहीं, इंसानियत है।
लेकिन पुरुष समाज को तो ऐसी स्त्री चाहिए जो उसके पैर की धूल बने, उसकी कही हर बात पर सिर झुकाए, उसके बंधनों में मुस्कुराती रहे।
और जो स्त्री ऐसा न करे—उसे चरित्र पर कटाक्ष कर के डराया जाए।

हकीकत यह है कि चरित्र का असली दिवालियापन उस पुरुष-समाज में है जो आज भी स्त्री की आज़ादी से डरता है।
जिसे एक पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर, आवाज़ उठाने वाली स्त्री से कंपकंपी छूटती है।
क्योंकि ऐसी स्त्री को गुलाम बनाना मुश्किल होता है।
ऐसी स्त्री को झुकाने के लिए “चरित्रहीन” जैसा लेबल सबसे आसान तरीका होता है—
एक गंदा लेकिन सदियों से चलता आ रहा तरीका।

कितनी विडंबना है—
पुरुष चाहे दस रिश्ते निभा आए,
दस घर तोड़ आए,
दस औरतों का सम्मान मिटा आए—
समाज उसे “मर्द” कहता है।
लेकिन स्त्री अगर अपनी आत्मा की सुन ले, अपना निर्णय खुद ले ले—
तो वही समाज उसे “चरित्रहीन” कह देता है।

चरित्रहीनता क्या है?
अपने अस्तित्व को झूठी सामाजिक मर्यादाओं के आगे गिरवी रखना?
या फिर उन मर्यादाओं की जंजीरें तोड़कर जीने की हिम्मत रखना?
अगर हिम्मत रखना चरित्रहीनता है—
तो हाँ, यह समाज हर मजबूत स्त्री को चरित्रहीन कहता रहेगा।
क्योंकि उसे मजबूत स्त्री से डर लगता है—
वह स्त्री जो सवाल पूछती है,
जो खुद को चुनती है,
जो ‘ना’ कहने की ताकत रखती है।

आज का सच बहुत साफ है—
स्त्री का चरित्र समाज के खोखले पैमानों से नहीं मापा जाएगा।
उसके चरित्र का पैमाना उसकी आत्मा की रोशनी है।
और वह रोशनी इतनी तेज़ है कि पुरुष-समाज की सदियों पुरानी सोच की दीवारें अब फटने लगी हैं।

यह लेख तीखा है क्योंकि सच तीखा होता है।
और स्त्री का सच जितनी तेज़ी से उठ रहा है—
उतनी ही तेजी से पुरुष-समाज की झूठी “चरित्र” की परिभाषाएँ ढह रही हैं।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें