गुरुवार, 20 नवंबर 2025

इश्क का सच

खुदा ने इश्क़ की परिभाषा दी,
और हम उसे समझने की जिद में उलझ गए।
हमने ख़्वाब का मतलब खोजा,
और ख़्वाब को ही अपनी हकीकत समझ लिया।

हमने मोहब्बत की है—
हर तरह की, हर रूप की,
खामोशी में छिपी,
आँसुओं में बहती,
और धड़कनों में गूँजती।

पर दुनिया ने देखा—
और हँसी में उड़ा दिया।
इश्क़ को सिर्फ़ मज़ाक समझ लिया,
और हमें सिर्फ़ एक कहानी।
जो पढ़ते ही भूले जा सकती थी।

हमने देखा—
इश्क़ वह नहीं जो शायर लिखते हैं,
वह नहीं जो फिल्में दिखाती हैं।
इश्क़ वह है जो चुप होकर टूटता है,
जो बिना किसी गवाही के मरता है,
और फिर अपने भीतर ही पुनर्जन्म लेता है।

हमने मोहब्बत की—
तो अपने आप को खोया,
तो अपनी चाहत को पाया,
तो अपनी कमजोरियों से मिले।

और जब हमने अपने इश्क़ की गहराई को समझा—
तब दुनिया ने मज़ाक बना दिया।
लेकिन क्या वे जानते हैं—
इश्क़ मज़ाक नहीं होता।
इश्क़ वह आग है जो जलाए बिना नहीं बुझती,
इश्क़ वह नदी है जो बिना किनारे खो जाए बहती है,
इश्क़ वह चुप्पी है
जो शब्दों से भी गहरी होती है।

हमने देखा है—
इश्क़ में जीने और मरने का अंतर बहुत छोटा है।
हमने महसूस किया है
कि एक मुस्कान कभी पूरी दुनिया की खुशियाँ नहीं देती,
और एक आँसू कभी पूरी पीड़ा नहीं कहता।

फिर भी हम जानते हैं—
इश्क़ सिर्फ़ अनुभव से लिखा जा सकता है,
शब्दों से नहीं,
हवा से, धड़कनों से,
और उन खामोशियों से,
जो केवल रूह सुन सकती है।

और इसीलिए,
हम इश्क़ को मज़ाक नहीं समझते।
हम इश्क़ को जीते हैं,
उसके दर्द को, उसकी हँसी को,
उसके टूटने और बनने को।

हम जानते हैं—
जो लोग इसे मज़ाक समझते हैं,
वे केवल अपने ख्वाबों में जीते हैं,
लेकिन जो इसे समझते हैं,
वे अपनी रूह को पहचानते हैं।

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