गुरुवार, 27 नवंबर 2025

कर्ज आत्मा और ब्रह्मांड के बीच अधूरा समझौता

कर्ज सिर्फ लेन–देन नहीं होता,
कर्ज — कर्म और परिणाम के बीच
एक अनलिखा अनुबंध है,
जिस पर जीवन अपने हस्ताक्षर भी नहीं करता,
फिर भी इसके पन्ने
मानव-आत्मा पर दर्ज होते जाते हैं।

जब कोई जन्म लेता है,
वह रोता हुआ आता है…
क्योंकि शायद आत्मा जानती है —
वह दुनिया में बिना कर्ज के नहीं आई।

मां की पीड़ा का ऋण,
पिता की उम्मीदों का ऋण,
समय की चाल का ऋण,
और परिस्थितियों के पाश का ऋण —
जीवन की पहली साँस से ही
अदृश्य रूप में साथ बंध जाता है।

कर्ज — ईश्वर का नहीं,
अपूर्णताओं का दिया हुआ है।
हर आत्मा इस धरती पर
अपना कोई अधूरा पाठ पूरा करने आती है।

कर्ज वह है
जो हमें उस लक्ष्य की ओर धकेलता है
जिसे हमने पिछले जन्म में अधूरा छोड़ दिया था।
शायद इसलिए
भागना मंज़ूर नहीं,
जीना ज़रूरी है।

कर्ज सिर्फ धन का नहीं,
सत्य का भी होता है।
किसी जगह हमने झूठ का सहारा लिया था,
कर्ज फौरन नहीं आता —
वो प्रतीक्षा करता है,
और फिर एक दिन
सच्चाई के रूप में
हमारे सामने खड़ा हो जाता है।

कर्ज — समय का भी होता है,
किसी दिन हमने जीवन को टाला था,
खुशी को टाला था,
प्यार को शायद चोट से बचाने के लिए रोका था —
और समय ने ब्याज जोड़कर
अधिक दर्द लौटाया।

कर्ज — प्रेम का भी होता है।
जिसे दिल से चाहा था
मगर पूरी तरह निभा न सके —
जीवन फिर किसी और आत्मा को भेजता है
उसी प्रेम का ब्याज लेने के लिए।

इस ब्रह्मांड में
कुछ भी बिना मूल्य के नहीं मिलता,
यहाँ तक कि सांत्वना भी
कभी–कभी कर्ज पर उधार ली जाती है।

जो बहुत रोता है
वह कर्ज चुका रहा होता है,
जो बहुत मुस्कुराता है
वह कर्ज बाँट रहा होता है,
और जो मौन है —
वह कर्ज को समझ रहा होता है।

ब्रह्मांड का नियम सरल है —
हर वह चीज़ जो हम ले लेते हैं
बिना स्वयं को पूर्ण किए,
एक दिन लौटानी पड़ती है।

घुटनों के बल या गर्व से,
आँसुओं से या ज्ञान से,
किसी इंसान के कंधे पर झुककर,
या ईश्वर की चौखट पर गिरकर —
पर लौटानी पड़ती है।

और अंत में…
जब आत्मा अपना अंतिम कर्ज चुका देती है —
वह मृत्यु नहीं —
मुक्ति कहलाती है।

फिर आत्मा, हल्की
बिना हिसाब, बिना बंधन,
ब्रह्मांड की शांत गोद में लेटती है —
जहाँ पहली बार वह समझती है —

जीवन कर्ज नहीं था,
कर्ज ही जीवन था।

और जीवन कठिन नहीं था,
आवश्यक था — पूर्णता के लिए।

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