तेरे रास्तों से, तेरे सफ़रों से,
हर दर्द की गठरी ढोते–ढोते
मेरे भीतर की चुप्पी टूट रही है।
फेफड़ों में कैद आख़िरी हवा
किसी बेक़रार दुआ-सी तड़प रही है,
दिल की धड़कन अपनी हथेली पर रखकर
जैसे खुद से कहती हूँ —
“बस अब बहुत हुआ…”
देखो, आँखों के कोरों में
नींद नहीं — विदाई तैर रही है,
जुब़ान चुप है पर आत्मा फुसफुसा रही है —
“मेरी कहानी बस यहीं तक थी।”
बांहों में अब ताक़त नहीं,
पर यादें अभी भी गर्म हैं,
कितनों को छूकर गुजरी हूँ,
कितनों को जीते–मरते देखा है मैंने।
तुम सुन रहे हो न?
मेरी देह की नहीं — मेरी पुकार की आवाज़,
जो एक खामोश प्रश्न बनकर
तुम्हारे सीने पर दस्तक देती है —
“अगली बार किसी के जीते–जी
उसकी कीमत समझ लेना…”
मैं मर नहीं रही,
बस लौट रही हूँ उस जगह
जहाँ दर्द नहीं, जहाँ अपेक्षा नहीं,
जहाँ शरीर नहीं — केवल आत्मा होती है।
और जाते–जाते मैं दुनिया से
सिर्फ एक ही शिकवा मांगती हूँ —
मुझे तब मत रोना जब मैं चली जाऊँ,
थोड़ा संभाल लेना जब मैं थी…
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