कौन मोमबत्ती पकड़ना सिखा गया हमें,
वरना…
हम तो वह सभ्यता थे
जहाँ स्त्री के आँसू से साम्राज्य काँपते थे।
हम वह युग थे
जहाँ नारी के सम्मान पर
राज्य नहीं, अहम गिरते थे
नदियाँ नहीं, अग्नियाँ बहती थीं
राज-सभा की ज़मीन पर नहीं,
दुराचारियों की गर्दन पर
न्याय लिखा जाता था।
आज पता नहीं कौन
हमें “याचना” सिखा गया,
जबकि हमारा इतिहास
“संरक्षण” नहीं —
प्रतिशोध की शक्ति से पगा हुआ था।
वो दिन कहाँ गए
जब सीता के आँसू
अयोध्या की दीवारों से टकराकर
लंका में अग्नि बनकर बरसे थे?
जब एक अपमान के कारण
महाभारत की रणभूमि
इतिहास में अपना नाम लिख गई थी?
कभी सत्यवती, कभी गार्गी, कभी अहिल्या,
कभी द्रौपदी, कभी दुर्गा, कभी भवानी —
नारी वह थी
जो पूजी भी गई और
अन्याय पर प्रलय भी बन गई।
फिर समय बदला…
और नारी बदल गई_ नहीं
उसे बदल दिया गया।
उसे सिखाया गया —
“संघर्ष मत करना, प्रार्थना करो।”
“हक़ मत मांगो, विनती करो।”
“अधिकार मत दिखाओ, बल्ब जलाओ।”
और आज
हज़ारों साल की वीरांगना
मोमबत्ती की लौ बनकर
अपनी ही सुरक्षा माँगती फ़िरती है।
कभी जिस स्त्री की आह
साम्राज्यों की नींव हिला देती थी,
आज उसका दर्द
मीडिया की सुर्खियों में तौल दिया जाता है।
कभी जिस स्त्री के लिए
सम्राटों की तलवारें झुक जाती थीं,
आज वही स्त्री
थानों में लाइन में खड़ी होती है
अपना सम्मान कागज़ पर साबित करने के लिए।
सवाल न्याय का नहीं,
चरित्र के गिरवी रख दिए जाने का है।
सवाल सुरक्षा का नहीं,
स्वाभिमान के ताले में बंद कर देने का है।
और नारी पूछती नहीं —
वह याद दिलाती है:
मैं वह आग हूँ
जो घर की देहरी से लेकर रणभूमि तक
सम्मान के लिए जलती है।
मैं वह शक्ति हूँ
जो रच सकती हूँ तो
संहार करना भी जानती हूँ।
मेरे आँसू दया नहीं, चेतावनी हैं —
क्योंकि जब नारी रोती है
तो प्रकृति क्रोध बुनती है।
मेरी मोमबत्ती को कमज़ोरी मत समझो —
यह अंधेपन को उजाला दिखाने का प्रयास है।
लेकिन याद रखना —
जब बोलना बंद कर दूँगी
तो इतिहास फिर से जलेगा,
लंका फिर से धू-धू कर गिरेगी,
और महाभारत किताबों तक सीमित नहीं रहेगा।
क्योंकि सृष्टि ने मुझे
उपासना के लिए नहीं बनाया —
सम्मान के लिए बनाया है।
और जिस दिन नारी को
सम्मान नहीं मिलेगा —
उस दिन मोमबत्तियाँ नहीं जलेंगी,
अग्नियाँ जलेंगी।
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