सुनो न,
कभी किसी शांत सुबह,
जब आसमान पर हल्की धूप उतर रही हो,
और मंदिर की घंटियाँ नींद से जाग रही हों,
तब चलो न मेरे साथ —
एक अनकही यात्रा पर।
मैं नहीं चाहती कोई आरती का शोर,
न भीड़, न फूल, न माला,
बस तुम्हारा मौन —
जो मेरे मन की आराधना को पूर्ण करे।
तुम चलना मेरे साथ,
जैसे समय ठहर गया हो,
पांवों में नंगेपन की सच्चाई हो,
और दिल में एक अटूट आस्था।
मुझे मिलाना है मेरे सौभाग्य को भगवान से,
पर मैं नहीं चाहती भगवान से माँगना कुछ,
बस कहना है —
“देखो प्रभु, यह है मेरा विश्वास,
जो इंसान के रूप में मेरे संग चला है।”
तुम्हारे कदमों की आहट में
मुझे अपनी किस्मत का संगीत सुनाई देता है,
जैसे मंदिर की सीढ़ियों पर
हर पग मेरा कर्म बनता जा रहा हो।
वो आरती की लौ —
तुम्हारी आँखों से टकराकर
मेरे माथे पर सिंदूर सा ठहर जाती है,
और मुझे लगता है —
शायद सौभाग्य यहीं खड़ा है,
तुम्हारे रूप में,
मेरे बगल में।
जब हम दोनों प्रणाम करेंगे साथ,
तो ईश्वर मुस्कराएगा शायद —
क्योंकि उसे भी समझ आएगा,
कि प्रेम और श्रद्धा
एक ही ज्योति के दो प्रकाश हैं।
तुम चलना उस दिन मंदिर मेरे साथ,
न किसी व्रत की कथा होगी,
न कोई इच्छा का प्रसाद,
बस एक मन, एक नयन, और एक धड़कन —
जो कहेगी चुपचाप —
“भगवान, हमने एक-दूसरे में तुम्हें पा लिया।”
और जब लौटेंगे हम,
तो मंदिर की सीढ़ियों पर पड़े फूलों की तरह,
हमारे कदमों में रह जाएगी
एक सुगंध —
सौभाग्य की,
श्रद्धा की,
और उस प्रेम की,
जो भगवान के भी आगे झुकने से इंकार नहीं करता,
क्योंकि वही उसका सबसे सुंदर रूप है।
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