मेरी ही धड़कनों की प्रतिध्वनि है,
यह उन आवाज़ों का शोर नहीं
जो लोग मेरे लिए तय कर देते हैं।
मैं अपनी अधूरी कहानियों की
सबसे पूर्ण पंक्ति हूँ,
किसी और की किताब में
सिर्फ हाशिये भर नहीं।
मैं गिरूँ भी तो
अपनी ही जमीन पर गिरूँ,
उठूँ भी तो
अपने ही इरादों के बल उठूँ—
लोग तो बस देखेंगे,
पर चलना मुझे ही है!
किसी की नज़र का तिरछापन
मेरी पहचान को टेढ़ा नहीं कर सकता,
आईने की सच्चाई जानती हूँ
मैं जो हूँ, वही दिखती हूँ।
मेरी उड़ान की ऊंचाई
किसी की तालियों पर नहीं,
मेरे विश्वास के परों पर है,
ये पंख उधार के नहीं—
मेरी ही रगों की ताक़त हैं!
मैं खुद की परिभाषा हूँ,
मैं अपनी वजह हूँ,
मेरा अस्तित्व…
मुझसे है—
लोगों की सोच से नहीं।
और हाँ—
जो मैं बन रही हूँ,
वह किसी की पसंद नहीं…
मेरे सपनों का फ़ैसला है!
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