गुरुवार, 27 नवंबर 2025

गुलमोहर अब भी खिलता है

गुलमोहर के मौसम में तुम थे…
एक मधुर उजाला, एक धीमी हवा, एक अनकहा आलाप
और अब उसी मौसम में तुम नहीं हो—
पर यादों की धुन पहले से ज़्यादा साफ़।

जब भी धूप की किरन टहनियों में उतरती है,
तुम्हारी मुस्कान पत्तों पर झिलमिल करती है,
जैसे समय ने तुम्हें छुपाया नहीं,
बस स्मृतियों के आइने में सदा के लिए धर दी है।

तुम्हारी हँसी की वो हल्की खनक,
आज भी हवा में कहीं गूँजती है,
मगर अब सुनने के लिए पास कान नहीं—
बस दिल के भीतर एक ख़ाली जगह धड़धड़ाती है।

तुम थे तो दुनिया एक उत्सव थी,
रंगों का, सुगंधों का, सौंदर्य का जश्न,
और आज भी है—पर तुम नहीं,
इसलिए हर रंग अपूर्ण, हर छाया कठोर और मुँहबंद।

गुलमोहर के फूल फिर—
ठीक उसी पुराने अंदाज़ में खिलते हैं,
क़िस्मत जैसे कहना चाहती हो—
“कुछ चीज़ें चली नहीं जातीं, कायम रहती हैं।”

पर मैं जानती हूँ,
ये खिलना तुम्हारी उपस्थिति नहीं—
तुम्हारी याद का अनंत स्वीकृति है।

जहाँ बैठकर तुम मुस्कुराया करते थे,
वहीं आज भी हवा मेरी बालों को छूती है,
जैसे तुम्हारा हाथ अब भी है—
बस मैं पकड़ नहीं पाती हूँ, पर महसूस करती हूँ।

दिन चले जाते हैं,
मगर वे क्षण जो तुम्हारे थे—
समय कभी उनसे जीत नहीं पाया।
वे आज भी इतने ही लाल, इतने ही गर्म,
जितने तुम्हारे कंधे पर सिर रखकर मुस्कुराए हुए दोपहर थे।

कितना अजीब है ना—
तुम चले भी गए… और रुके भी रह गए।
अनुपस्थित भी हो, और सबसे ज़्यादा उपस्थित भी।

कभी–कभी लगता है
तुम मेरे दुख की मिट्टी में सांत्वना बनकर उग आए हो,
किसी अदृश्य प्रार्थना की तरह
जो आँसूओं को स्पर्श कर के रुक जाती है।

तुमसे बिछड़ना गया—
पर तुम्हें भूलना न गया, न होना था।
कुछ लोग याद नहीं, आत्मा बन जाते हैं।

और तुम—
याद नहीं, आत्मा में उतरे शब्द हो,
नाज़ुक भी, गहरे भी,
सोए भी, जागते भी।

गुलमोहर आज भी खिलता है—
हर उस लाल पंखुड़ी में
तुम्हारी हँसी की गर्माहट चमकती है।

आज तुम मेरे साथ नहीं चल रहे,
पर मेरे भीतर चल रहे हो…
हर धड़कन की राह पर।

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