जैसे समय की मुट्ठी को
जबर्दस्ती बंद कर देना चाहते हों।
कोई घर भर रहा है,
कोई अलमारी,
कोई मन की दरारों को
चीज़ों से भरने की कोशिश कर रहा है।
किसी को लगता है
कि संग्रह ही सुरक्षा है,
कि जितना अधिक होगा
उतना कम टूटेंगे।
पर कौन समझाए उन्हें
कि टूटन तो वहीं से शुरू होती है
जहाँ हम चीज़ों की कीमत
खुद से ज़्यादा लगाने लगते हैं।
लोग दौड़ते रहे—
सोना बटोरते,
नाम बटोरते,
चेहरे बटोरते,
तारीफ़ों के सिक्के बटोरते हुए,
और रास्ते में
अपनी ही सहज मुस्कान कहीं गिरा आए।
वे दिल से दिल तक जाने वाली
वह पगडंडी भूल गए
जिस पर चलकर
कभी इंसान अपने ही भीतर पहुँचता था।
उधर समय—
एक बूढ़ा फ़कीर—
हाथ में ख़ाली कटोरा लिए
मुस्कुराता रहता है।
उसे पता है
कि सब कुछ लेने की चाह में
अंत में मनुष्य
अपने हाथ खाली ही करता है।
किताबों की अलमारियाँ भरे रह जाती हैं,
पर जीवन की पंक्तियाँ अधूरी।
कपड़ों की तहें बढ़ती रहती हैं,
पर रिश्तों की सिलवटें गहरी हो जाती हैं।
और हम—
दिनों को जमा करते-करते
पलों को गँवा देते हैं।
एक दिन
जब आख़िरी साँस
धूल की तरह हथेलियों में फिसलती है,
समझ आता है—
कि जाना तो अकेले ही था,
और साथ केवल
वे प्रेम के निशान आते
जो हमने कभी कमाने के लिए नहीं,
बस बाँटने के लिए रखे थे।
अंत में
न सोना जाता है,
न शोहरत,
न तस्वीरों के ढेर—
सिर्फ़ वही हल्का-सा उजाला जाता है
जो हमने किसी की सुबह में भर दिया था।
बाकी सब कुछ
कक्ष में पड़ा रह जाता है—
और हम
वही लौट जाते हैं
जैसे आए थे…
खाली हाथ,
पर उम्मीद है—
थोड़ा हल्का दिल लेकर।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें