शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

सरनेम की सिलवटों में दबी स्त्री

सरनेम…
एक ऐसा शब्द
जो जन्म लेते ही
किसी लड़की की आत्मा पर
पहले पहरेदार की तरह टांका जाता है —
“ये तुम्हारी पहचान नहीं…
तुम्हें बस इसे ढोना है।”

माँ की कोख में पल रही बच्ची
अस्तित्व से पहले ही
किसी और की कुल-परंपरा लिख दी जाती है,
मानो जन्म से पहले ही तय हो गया हो —
वो अपना नहीं, उधार का वजूद है।

फिर बड़ी होती है…
पढ़ती है, बढ़ती है, सपने पकड़ती है,
पर हर दस्तावेज़, हर फ़ाइल में
उसका नाम नहीं —
किसी “वंश” की मुहर थोप दी जाती है।

और विवाह?
कहते हैं — “नई जिंदगी की शुरुआत।”
पर छिपे सच में
वो पुरानी पहचान का अंतिम संस्कार होता है,
क्योंकि सरनेम बदलते ही
उसकी पूरी कहानी मिटा दी जाती है —
तालियों के बीच… ख़ामोशी की मौत।

उसके नाम के बाद जो जुड़ता है
वो सम्मान नहीं —
एक अनकहा करार होता है
कि तुम कभी अपनी नहीं हो सकती,
पहले पिता की विरासत, फिर पति की परछाई,
और अंत में
बेटों की पहचान में गुम हो जाओगी।

स्त्री के लिए सरनेम
कफन नहीं…
उसकी स्वतंत्रता का ताला है,
जिसे समाज कंगन की तरह पहनाता है
और कहता है —
“यह है तुम्हारी मर्यादा।”

काग़ज़ पर नाम बदलने की क़ीमत
एक हस्ताक्षर से चुकाई जाती है,
पर आत्मा बदलने की क़ीमत
सदियों से स्त्रियाँ अपने पूरे जीवन से देती आई है।

पर आज की स्त्री…
अब चुप नहीं है।
वह कफ़न से कफन तोड़कर उठ खड़ी है —
कहती है:
“मेरी पहचान मेरा जन्म है,
तुम्हारा दिया हुआ उपनाम नहीं।”

वह अपने नाम को
अपने संघर्ष, अपने लेखन, अपने कर्म,
अपने साहस में बुन रही है।
अब किसी कुल का गौरव नहीं —
वह खुद एक वंश बन रही है।
स्वयं इतिहास लिख रही है
बिना सरनेम के भी पूर्ण,
क्योंकि वो जान चुकी है —

 असली नाम वही होता है
जिसे दुनिया बदल दे,
न कि वह
जिससे दुनिया स्त्री को बदल दे।

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