हारने के बाद कहानी खत्म नहीं होती,
बस मैं चुप हो जाती हूँ —
थोड़ा थककर, थोड़ा टूटी हुई,
पर भीतर कोई शब्द
अब भी साँस ले रहा होता है।
मैं अपनी राख में से
कविता चुन लेती हूँ,
अपने आँसुओं से
स्याही बना लेती हूँ,
और लिख देती हूँ —
“यह अंत नहीं, यह आरंभ है।”
जो मुझे गिरा सके,
वो अब तक जन्मा नहीं।
क्योंकि मैं हर गिरावट में
एक नई ज़मीन पा लेती हूँ।
मैंने सीखा है —
हार भी एक तरह की जीत होती है,
बस वो ताज नहीं पहनती,
बल्कि आत्मा के माथे पर अनुभव बनकर चमकती है।
लोग कहते हैं,
कहानी यहीं खत्म हुई —
मैं मुस्कुराती हूँ,
कलम उठाती हूँ,
और कहती हूँ —
“अब असली अध्याय शुरू होता है।”
क्योंकि मैं वही स्त्री हूँ
जो रोकर भी मिट्टी नहीं छोड़ती,
बल्कि उसी मिट्टी से
अपनी अगली सुबह गढ़ती है।
मेरी हारें भी मेरे गर्भ में पलती हैं,
वहीं से जन्म लेता है
मेरा अगला स्वर,
मेरा अगला अस्तित्व।
मैं जानती हूँ —
हारना सिर्फ ठहरना है,
जैसे समुद्र लहर बनने से पहले
एक पल को ठहरता है।
मेरी चुप्पी कभी-कभी
इतिहास लिख देती है —
जिसे आने वाले पढ़ते हैं
"स्त्री का पुनर्जन्म" कहकर।
तो मत समझो कि मैं हारी हूँ,
मैं बस अगले अध्याय में चली गई हूँ,
जहाँ मेरी कलम
मेरे आँसुओं की जगह
प्रकाश लिखती है,
और मेरा मन —
अपना भाग्य खुद गढ़ता है।
कहानी खत्म नहीं होती मुझसे,
कहानी तो मैं ही हूँ।
और मैं जब भी गिरती हूँ,
धरती कविता बन जाती है। ✨
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