जो बस चमक को पहचानते हैं,
जो दिखे नहीं आँखों को,
उसे सब यूँ ही अनजान कहते हैं।
झिलमिल-झिलमिल नक़ली चेहरे,
भीड़ के आगे सिर उठाए,
और सच की खामोशी गलियों में
अपना दामन सम्भालती जाए।
कितने पत्थर ताज पहनते,
कितने हीरे गुमनामी ढोते,
दिखावे की दौड़ में साहब,
सच्चे लोग ही पीछे होते।
पर सुनो—
फीका नहीं पड़ता नूर मेरा,
बस धूल ने चेहरा ढका है,
ये दुनिया चमक पर मरती है,
मैं मिट्टी में भी चमका हूँ,
क्योंकि मैं—
हीरा हूँ… नक़ली जमाने का सच का टुकड़ा।
जब वक्त दर्पण लेकर आएगा,
तो सच सामने आएगा,
चमकते पत्थर टूट गिरेंगे,
हीरा ही अपना ताज पाएगा।
आज मैं चुप हूँ तो क्या,
किसी दिन बोल उठूँगी…
भीड़ के शोर से ऊँची—
अपनी पहचान खोल उठूँगी।
मैं दिव्या हूं बेशक
भीड़ का हिस्सा नहीं,
भीड़ की एक कहानी हूँ।
आज अनदेखी सही, पर कल—
सबकी ज़रूरत बन जाऊंगी।
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