और मैंने अपने भीतर
सिर्फ एक जीवन नहीं,
पूरा ब्रह्मांड रख छोड़ा है।
मेरी देह—
धरती की तरह शांत दिखती है,
पर मेरी चेतना में
आकाश का असीम फैलाव है।
मैं चलती हूँ
तो दिशाएँ जन्म लेती हैं,
मैं रुकती हूँ
तो समय ठहरकर
अपना अर्थ बदल लेता है।
मेरे भीतर—
तारों की धूल है,
नीहारिकाओं की चमक है,
अदृश्य प्रकाश के वे रहस्य हैं
जिन्हें वैज्ञानिक नहीं,
केवल संवेदनाएँ समझ सकती हैं।
मैं स्त्री हूँ—
मैंने अपनी साँसों में
अनगिनत युग सँजो रखे हैं।
मेरे मौन में
इतिहास की वह गूँज है
जिसे किसी ने लिखा नहीं,
पर सबने जिया है।
मेरी आँखों के कोरों में
चाँदनी के बीज हैं,
और मेरे आँसुओं में
गंगा की धार।
मैं गिरती हूँ
तो जल बन जाती हूँ—
पवित्र, अडिग, चलायमान।
मैं उठती हूँ
तो अग्नि—
बिना आवाज़ की
पर भस्म करने वाली।
मेरी हँसी में
पहली सुबह की तपिश है,
मेरी साँसों में
पहले संगीत की लय।
मेरी धड़कनों में
ब्रह्मा का सृजन,
विष्णु का संरक्षण,
और शिव का संहार
एक साथ धड़कते हैं—
और दुनिया समझ नहीं पाती
कि वह एक स्त्री की धड़कन सुन रही है
या सृष्टि की नब्ज़।
मैं स्त्री हूँ—
मैं टूटती नहीं,
अपने को नए आकार में ढालती हूँ
जैसे आकाश
हर रात नया नक्षत्र चुन लेता है।
मैं जन्म देती हूँ—
पर सिर्फ शिशुओं को नहीं,
स्वप्नों को,
विचारों को,
संस्कृतियों को,
और कभी-कभी
उन क्रांतियों को
जिनसे सभ्यताएँ डरती हैं।
मेरी देह पर उगे घाव
कहते हैं—
मैंने दर्द को भी
पालना बनाकर रखा,
और उससे एक नई ऊर्जा को
जन्म दिया।
लोग कहते हैं
एक स्त्री सब सह लेती है—
पर सच यह है
कि मैं सहती नहीं,
परिवर्तित करती हूँ।
दुख को करुणा में,
क्रोध को शक्ति में,
और अपमान को
एक मौन प्रतिज्ञा में—
कि मैं फिर उठूँगी
और उठकर
अपने भीतर का ब्रह्मांड
थोड़ा और विस्तृत कर दूँगी।
मैं स्त्री हूँ—
मेरे भीतर
आकाश की गहराई,
समुद्र की स्पष्टता,
अग्नि का साहस,
धरती का धैर्य
और हवा की स्वतंत्रता
सभी का संगम है।
मैं वही हूँ
जिसे दुनिया समझने की कोशिश करती है,
पर समझ पाती नहीं—
क्योंकि मैं एक पुस्तक नहीं
जिसे पढ़ लिया जाए,
मैं तो वह ब्रह्मांड हूँ
जिसमें डूबकर ही
मेरा अर्थ मिलता है।
हाँ—
मैं स्त्री हूँ,
और मैंने अपने भीतर
पूरा ब्रह्मांड समेटा है—
इतना विशाल,
इतना गहरा,
इतना अनकहा
कि इसे लिखते हुए भी
कविता नहीं,
बस एक रोशनी झरती है।
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