ज़िंदगी कैसे जीना चाहते हो?
कहते हो — अच्छी तरह, मुस्कान से,
तमन्नाओं के फूल बिछाकर…
हाँ, जवाब सुनने में सुहाना लगता है,
पर जीवन इतना सादा खेल नहीं,
ये एक परीक्षा है —
जहाँ प्रश्न तुमसे पूछे जाते हैं,
पर उत्तर समय लिखता है।
ज़िंदगी श्वासों की गिनती नहीं,
उन श्वासों का अर्थ है —
जो किसी और के लिए जिए जाएँ,
किसी की पीड़ा में मरहम बन जाएँ,
किसी की थकी आत्मा को सहलाकर
उम्मीद का दीप जला जाएँ।
जीवन पत्थर नहीं —
धड़कनों वाला प्रवाह है,
थिर खड़ा नहीं —
अनवरत बदलता हुआ अथाह है।
कभी गगन, कभी धरती,
कभी आँधी, कभी चांदनी,
यही तो इसकी कशिश है —
यही तो इसके मायने।
हमने कई बार सिर्फ़ “घर” बनाया,
और दुनिया में पिछड़ गए,
कई बार सिर्फ़ “दुनिया” को निहारा,
और भीतर से बिखर गए।
नींव बिना मंज़िल खड़ी की —
तो ढहने का डर,
मंज़िल की कोशिश किए बिना
नींव सजाए रखी — तो व्यर्थ प्रहर।
जीवन कहता है —
“सबको पाना नहीं,
किसी के काम आना जरूरी है;
अकेले खिलना नहीं,
किसी के लिए महकना जरूरी है।”
ये धरती हमारी कर्जदार नहीं,
हम इस मिट्टी के ऋणी हैं —
जो सांसों की धरोहर हमें सौंपकर
हमसे अर्थ की फसल चाहती है।
सदियाँ बदलती रही हैं,
पर सत्य नहीं बदला —
जिसने समय का महत्व खोया,
उपलब्धि को दूर कर लिया।
एक अवसर —
बस एक ही बार आता है,
दूसरे मौके से पहले
पहला पल लौट जाता है।
और फिर स्मृतियों का ग्रंथ
धीमे से फुसफुसाता है —
वर्तमान भविष्य से नहीं,
अतीत के कर्मों से बनता है।
परशुराम भी यही कहते हैं —
“लीलाएँ बहुत हो गईं,
संगीत बहुत बजा लिया,
अब वह करो
जिस उद्देश्य से जन्म लिया था।”
तभी तो जीवन की वीणा
सही सुरों में बजती है —
जब हम स्वयं के लिए कम,
और संसार के लिए अधिक जीते हैं।
इसलिए —
मत पूछो कि जीवन तुम्हारे लिए क्या है,
पूछो — तुम जीवन के लिए क्या हो?
तब समझ पाओगे —
ज़िंदगी सिर्फ़ जीने की चीज़ नहीं,
ज़िंदगी निभाने की जिम्मेदारी है,
एक पवित्र व्रत है,
जिसका फल अंत में नहीं,
हर पल में मिलता है। ✨
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