शुक्रवार, 19 जून 2020

जब वो उदास होती है

जब वो उदास होती है
तितलियों से मांग के रंग
बनाती  है इन्द्रधनुष
खामोश शब्दों मे
भरती है गुनगुनाहट 
लेट कर घास पर
ढूंढती है चेहरे  बादलों मे
खेलती है पानी से
 बटोरती है सीपें 
बना के अपने चारों ओर क्यारियाँ
खुशियाँ बीजती है
दौड़ती है नंगे पाँव
ओस के खेतों मे
खुद को दुलारती ,है
 मनाती है खुद ही को
जब वो उदास होती है
अपने बहुत पास होती है।।

मैं वक्त हूँ

मैंने हर राह पर
रिश्तो को तड़पते
हुए देखा है.....
ये दम तोड़ते रिश्तें
ग़मों से भागते रिश्तें
सिसकते हुए
हर बार
टूटते हुए 
बार बार
देखा है.....
मैंने हर राह पर
रिश्तो को खाक होते
जमीं पर लोटे
खुदी पर रोते
तड़पते हुए
मचलते हुए
देखा है......
मैंने हर राह पर
रिश्तो को 
कफ़न में 
लिपटते हुए
अगन में जलते हुए
बार बार दम
तोड़ते हुए देखा है.......
........................
.......रिश्तों की आपा
धापी में तूने मुझे भुला दिया
देख मुझे
मै वक्त हूँ
मै वक्त हूँ
मै वक्त हूँ

ये तन्हा रात है

ना प्रियतम का साथ है
ना उभरे कोई जज्बात हैं,
बस मै हूँ ..सिर्फ मै
और ये तनहा रात है।

ना तारें हैं टिमटिमाने को 
ना चाँद है गुनगुनाने को 
बस स्याह अकेली रात है 
मन मेरा बहलाने को 
ना होठों पर है हंसी
ना आंसुओ की सौगात है 
बस मै हूँ ..सिर्फ मै 
और ये तनहा रात है ।

ना स्याही है कलम में,
आक्रोश के शब्द बहाने को
ज़ज्ब कर गया कोरा कागज़ ,
दिल के सारे फसानो को
ना ख़ुशी से कोई उमंग ,
ना गमो का एहसास है ..
बस मै हूँ ..सिर्फ मै
और ये तनहा रात है ।

रविवार, 14 जून 2020

अवसाद की सीढ़ी

आत्महत्या या मर्डर
मिस्ट्री सॉल्व नही हुई और तबतक कुछ नही कहा जा सकता जबतक इसपर खोजबीन न हो जाये..सुशांत सिंह राजपूत का इस तरह से जाना पूरे देश के लोगो के लिए एक सदमा से कम नही..मैं ये तो नही कह सकती कि ये पूरी तरह से आत्महत्या है क्योंकि अभी समाचारों और उनके प्रियजनों से जो सुना वो सुनकर कत्तई विश्वास नही होता कि इतना जिंदादिल  और लगातार कामयाबी की सीढ़ी चढ़ने वाला हँसमुख सुशांत आत्महत्या कर लेगा।
  अगर ये आत्महत्या है तो मैं बहुत चिंतित हूँ ये युवा पीढ़ी का कैसा कैसा भटकाव है जो दिल और दिमाग पर इस तरह से हावी हो जा रहा कि वो अपनी वास्तविकता को भूल जा रहे...पैसा कामयाबी मन के भटकाव का सोर्स तो नही...मुझे दुःख है समाज के इस नए सोच पर की नए आसमान को छूने की जो सीढ़िया वो बनाते है उसमें छड़ गिट्टी बालू सीमेंट सब अवसाद के होते है...हालांकि कामयाबी की सीढ़ी चढ़ने के आरम्भ में उन्हें सिर्फ और सिर्फ अपनी मंजिल दिखती है पर वो रास्ता कैसा है इसका ज्ञान नही होता..पर जब होता है तब शायद वो अवसाद के बोझ के नीचे पूरी तरह दब गए होते है।
  मेरा एक निवेदन है आजकी युवा पीढ़ी से कामयाबी के रस्ते ऐसे बनाओ की भविष्य में किसी तरह के बोझ को उतारने जैसा न हो किस्मत और भाग्य दोनो ही अटल सत्य है लाख प्रयास करने के बाद मंजिल न मिल पाए तो दूसरे रास्ते पर चलने की जरूरत है 
अवसाद या निराशा कभी नई मंजिल नही दिखाती वो दिखाता है तो अंतिम रास्ता..और कामयाब हो गए तो उस हद तक मत जाओ जो तुम्हारी सोच और हैसियत से परे हो वो भी अंतिम मार्ग ही दिखायेगा...दुःख जीवन मे कुछ ही पल के लिए आता है लेकिन अवसाद पूरी जिंदगी तबाह कर देता है दो दिन के दुख के लिए पूरी जिंदगी दांव पर लगाना ये उचित नही...सुशांत के मृत्यु की वजह जो भी हो पर युवा पीढ़ी के लिए एक सबक है कि परिस्थितिया किसी की दास नही इसे अपने अनुकूल बनाना पड़ता है एक सुखद अंत के लिए।

धन्यवाद

शनिवार, 13 जून 2020

आदमी आदमी सा

बन जाए अगर आदमी आदमी सा ।
के फितरत नहीं आदमी आदमी सा ॥

ना आंसू बहेंगे आंखों से किसी के
गर काटे कोई आदमी आदमी सा ॥

दीवाना हुआ है वो पागल भी मानों
दिखा है कोई आदमी आदमी सा ॥

कहे क्या कोई अब फ़साना ग़मों का
हँसेंगे सभी कह आदमी आदमी सा ॥

हंसीं खेल में तबाह ना कर किसी को
दिल तेरा भी है आदमी आदमी सा ॥

दिखे है मुझे अब विरानियाँ शहर में
क्या है गाँव में आदमी आदमी सा ॥

मुल्कों में ना होगी यूँ सरहद की बातें
बन जाए अगर आदमी आदमी सा ॥

वो कौन है जो कोने में सिसक रहा है
पूछो अभी आदमी आदमी सा ॥

शुक्रवार, 12 जून 2020

बिखराव

जर्रा जर्रा हर रोज बिखर रहा है आदमी।
रोज अपनी ही चाल चल रहा आदमी।।

दंभ और द्वेष में जल रहा कोना कोना।
देखकर भी नही सम्भल रहा आदमी।।

रूह अपनी कठपुतली गैर की हाथों का।
खुद ही अपनी सूरत बदल रहा आदमी।।

इश्क के नाम पर ठगा ठगा सा हरदम।
खुदगर्जी की आग में जल रहा आदमी।।

न सूरत बदली न सीरत बदलने की चाह।
बस अपनी ही धुन में चल रहा आदमी।।

मुझको मालूम है दुनियाँ के दस्तूर दिव्या।
बचा कुछ भी बस युही मचल रहा आदमी।।

धन्यवाद