मंगलवार, 18 नवंबर 2025

कमाल है ये मुहब्बत

मोहब्बत… तूने भी अजीब खेल रचा है, मौला।
दिल भी तूने दिया, धड़कन भी तूने लिखी,
पर दोनों पर हक़
किसी और का कर दिया।

तेरी ही मस्ज़िद की सीढ़ियों पर,
तेरी ही मंदिर की दीवारों के बीच,
तेरी ही चौखट के सामने
लोग घिसते हैं अपने घुटने,
पर तू देख—
उनकी प्रार्थनाएँ तेरी तरफ़ कम,
किसी और की तरफ़ ज़्यादा जाती हैं।
किसी नाम के लिए,
किसी चेहरे के लिए,
किसी ऐसी मोहब्बत के लिए
जो अक्सर नसीब से ज्यादा दर्द देती है।

ये कैसी रेखा खींची है तूने, मालिक?
तेरे सामने रोते हैं,
पर मांगते किसी और को हैं।
तेरे सामने टूटते हैं,
पर टूटन की वजह भी कोई और होता है।
तूने रूह बनाई—
पर उसके अंदर की आग
किसी और की सांस से जलती है।

आँखें तूने दीं,
पर उनमें चमक किसी और के आने से चढ़ती है।
हाथ तूने बनाए,
पर कांपते किसी और की दूरी से हैं।
दुआ तूने सिखाई,
पर हर दुआ की पहली पंक्ति
किसी और का नाम लेकर ही शुरू होती है,
और आख़िरी पंक्ति
उसी को खोने के डर में खत्म होती है।

मोहब्बत, मौला, तूने सच में अजीब बनाई है—
जिसे दिल में बसा लिया जाए
उसी से सबसे ज़्यादा डर लगता है।
जिसे पाने की दुआ तुझसे की जाए
वही दुआ टूटकर लौट आती है
और इंसान फिर तेरी चौखट पर
अपने आँसू गिनता है।

लेकिन कमाल ये है—
टूटकर, बिखरकर, हारकर
इंसान तेरे पास लौटता है।
क्योंकि मोहब्बत चाहे किसी से भी हो—
सुकून तो केवल तू ही है
जो बिना मांगे भी हाथ थाम लेता है।

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