पत्थरों सा बुत बनना,
लोग झुकेंगे सही,
पर महसूस न कर पाओगे उनका झुकना।
सीख लो नटों की तरह
इशारों पर मुस्कुराना,
जमाने की तालियों में
अपना सच दबा जाओगे।
अगर मिली है ज़िंदगी
एक आम इंसान की तरह,
तो शुक्र मनाओ,
कि अब भी दिल में धड़कनें ज़िंदा हैं।
आज़ादी की हवा में सांसें ले रहे हो,
तो उसी को इबादत समझो।
क्योंकि ऊंचाइयों की दौड़ में
सुकून अक्सर पीछे छूट जाता है।
बड़े बनकर अमन खो दोगे,
और चिंताओं की गठरी
कंधों पर ओढ़ लोगे।
पर्दे के पीछे बैठे काले चेहरे
तुम्हारे अपने बन जाएंगे,
पर सच्चाई से नज़रें
कभी नहीं मिला पाओगे।
इसलिए…
आम रहो, इंसान रहो —
भीड़ में खो जाना बेहतर है
किरदार बन जाने से।
क्योंकि जो आम हैं, वही असली हैं,
बाक़ी सब तो बस दिखावा हैं।
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