मेरी भी एक दुनिया है…
पर अजीब-सी बात ये है
कि दोनों दुनियाओं के दरमियान
एक तीसरी दुनिया बसती है—
जहाँ हम हैं… और सिर्फ़ हम।
वो दुनिया न रिश्तों की मोहताज,
न समाज के तराज़ू में तौली जाती है,
वो दिल की धड़कनों की भाषा में लिखी,
ख़ामोशियों की किताबों में बोली जाती है।
यहाँ न वक़्त हुकूमत करता है,
न दूरियाँ फ़ैसले सुनाती हैं,
यहाँ तो आँखें हंसती हैं
और ख़ामोशियाँ गले लग जाती हैं।
इस दुनिया में न वादा ज़रूरी,
न क़समों की रीतें,
यहाँ बस एक एहसास ही काफ़ी है
जो हर बार हमें एक-दूजे तक खींच लाता है।
तुम्हारी राहें भले अलग हों,
मेरे मंज़िलें भले जुदा,
पर हमारी इस पावन दुनिया में
हर सफ़र की पहली और आख़िरी मंज़िल—
हम ही तो हैं।
ये दुनिया अनोखी है,
पवित्र है,
बिना नाम के भी मुकम्मल है—
क्योंकि इसे हमने नहीं बनाया,
यह तो हमारी रूहों ने
एक-दूसरे में जन्म लिया है…
और रूहों की ये दुनिया
कभी ख़त्म नहीं होती…
कभी जुदा नहीं होती…
बस अनकही-सी होकर भी
हमेशा जीती रहती है—
तुममें भी…
और मुझमें भी…
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