गुरुवार, 20 नवंबर 2025

रूह की कब्र

एक तवायफ ने क्या खुब कहा—
“यह केवल एक शरीर नहीं,
यह एक रूह की कब्र है,
जिसे दुनिया ने सिर्फ जिस्म समझ लिया।”

और लोग आए,
आँखों में चमक, हाथों में लालच,
बस इस तरह के जिस्म को देख कर
उसे अपनी माया की हद में बांधने को तैयार।
पर उन्होंने देखा नहीं, सुना नहीं—
जो भीतर जल रहा था,
जो भीतर टूट रहा था,
वह कोई देख नहीं सकता था।

हर मुस्कान में एक कराह छिपी थी,
हर नाच में एक चुप्पी थी।
और तवायफ हँसती रही,
क्योंकि वह जानती थी—
लोग उस रूह के सिसकनों को महसूस नहीं कर सकते,
जो उसके भीतर हर पल जागती रहती थी।

उसने कहा—
“तुम केवल इस चमकती त्वचा को देख रहे हो,
मुझे नहीं देख रहे, मेरी धड़कन को नहीं सुन रहे।
यह केवल मेरा जिस्म है,
लेकिन मेरी रूह…
ओ मेरी रूह…
वह कभी तुम्हारे हाथ में नहीं आएगी।”

और लोग मुस्कुराए,
लेकिन समझ नहीं पाए।
वे उसे सिर्फ अपना अक्स दिखा सकते थे,
लेकिन वह तो खामोशी में,
अपने भीतर की गहराई में जी रही थी।

क्योंकि रूह कभी बंदी नहीं होती,
रूह कभी बिकती नहीं,
रूह की हर सांस
स्वतंत्रता की चिंगारी लिए होती है।
और वही चिंगारी, वही आवाज, वही खामोशी,
दुनिया नहीं सुन पाती,
लेकिन जो महसूस कर सके, वही उसे समझ पाता।

तवायफ ने फिर धीरे से कहा—
“दुनिया जिस्म को पहचानती है,
लेकिन रूह की पहचान तो केवल वह कर सकता है,
जो भीतर उतर सके,
जो दर्द को महसूस कर सके,
जो प्रेम और अकेलेपन के बीच की खाई देख सके।”

और वह नाचती रही, हँसती रही,
क्योंकि वह जानती थी—
उसका जिस्म दुनिया का था,
पर उसकी रूह उसकी थी।
अपरिवर्तनीय, अजेय,
और हमेशा मुक्त।

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