अब तो साँसे भी बोझ लग रही…
ये पंक्ति मैं रोज़ अपने भीतर दोहराती हूँ,
जैसे कोई कैदी दीवार पर खरोंचते-खरोंचते
दर्द का कैलेंडर पूरा करता है।
मैं भी अपना हर दिन उसी तरह गिनती हूँ —
कितना जिया नहीं… कितना सहा।
घर की दीवारें मेरा नाम जानती हैं,
पर मेरा दुख नहीं,
आईना चेहरा पहचानता है,
पर आँखों की बाढ़ नहीं,
लोग मेरे शिष्टाचार को सलाम करते हैं,
पर मेरे टूटे मन की धुन नहीं सुनते।
भीड़ में चलते हुए मैं बिल्कुल अकेली हूँ —
इतनी अकेली कि अगर मैं रुक भी जाऊं
तो दुनिया आगे बढ़ जाएगी,
जैसे मैं कभी थी ही नहीं।
किसी ने पूछा नहीं —
कि मुस्कान कितनी भारी है,
कि चुप रहना कितना मुश्किल है,
कि रातें कितनी काली हैं,
और नींद… नींद कब से नाराज़ है।
हर सुबह अलार्म से नहीं,
ज़िम्मेदारियों की धमक से आँख खुलती है,
और हर रात बिस्तर से नहीं,
गिल्ट की कँटीली घास पर सोती हूँ।
अच्छा होना, मजबूत होना, धैर्य रखना,
इन शब्दों ने भी मेरी कमर तोड़ी है —
उम्मीदों के वजन से,
समझौतों की रेत से,
और सपनों के शव से।
कहते हैं — “लोगों के लिए जीओ”,
पर मैं पूछती हूँ —
किसी ने कभी मेरे लिए जिया है?
किसी ने कभी मेरा हाथ पकड़कर कहा है
कि थक गई हो तो रुक जाओ, मैं हूँ न?
नहीं।
हर बार मुझे ही योद्धा बनना पड़ा,
ढाल भी मैं, घाव भी मैं,
युद्धभूमि भी मैं,
और जीत लेने के बाद भी
ताली किसी और के हिस्से में गई।
और आज जब अंदर का शोर
बोलने लगा है सीने पर मुक्के मारकर,
तब भी दुनिया कहती है —
“थोड़ा और सह लो… सब ठीक हो जाएगा।”
नहीं।
अब नहीं।
घुटन भरी ज़िंदगी से मुक्त कर दो,
अब तो साँसे भी बोझ लग रही…
ये हार नहीं — ये अंतिम सत्य है,
ये झुकना नहीं — ये आत्मा का अंतिम विरोध है।
मैं मरना नहीं चाहती —
मैं जीना चाहती हूँ।
पर ऐसे नहीं…
जहाँ धड़कन भी आदेशों पर चले,
जहाँ आँसू भी नक़ाब पहनकर बहें,
जहाँ ज़िंदगी… ज़िंदगी ना लगे।
मुझे एक ऐसी सुबह चाहिए
जहाँ सूरज मेरी तरफ़ हो,
मुझे एक ऐसा प्यार चाहिए
जो मेरे खिलाफ़ न हो,
मुझे एक ऐसा जीवन चाहिए
जहाँ हर सांस मेरी हो।
मैं अंत नहीं मांग रही…
मैं शुरुआत मांग रही हूँ।
मैं आज़ादी नहीं मांग रही…
मैं अपना पूरा अस्तित्व मांग रही हूँ।
अगर यह गलत है—
तो मुझे गलत ही रहने दो।
अगर यह स्वार्थ है—
तो आज पहली बार मैं स्वार्थी बनने दो।
क्योंकि आज…
मैं सिर्फ़ एक ही चीज़ की भीख मांगती हूँ —
मुझे वो ज़िंदगी लौटा दो
जिसे जी सकूं
ना कि सिर्फ़ ढो सकूं। 🌹
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