और मैं स्वयं को केवल एक शरीर की सीमा में नहीं बाँधती।
मैं जीवन के उस विचार में विश्वास रखती हूँ
जहाँ देह एक यात्रा है—
और दान, उस यात्रा का सबसे पवित्र पड़ाव।
मैं देहदानी हूँ।
क्योंकि मैं चाहती हूँ कि
मेरे जाने के बाद भी मेरे होने का अर्थ बना रहे।
मेरी देह का हर अंश
किसी और की साँस, किसी और की उम्मीद,
किसी और के जीवन की रोशनी बन सके।
मेरी पहचान यही है—
कि मैं जीवन को सिर्फ जीना नहीं,
बल्कि आगे बढ़ाना चाहती हूँ।
मैं चाहती हूँ कि मेरे अस्तित्व की आख़िरी धड़कन
किसी अनजान व्यक्ति के भीतर
नई शुरुआत का पहला संकेत बने।
मैं यह विश्वास लेकर चलती हूँ
कि मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म
दूसरे मनुष्यों के लिए उपयोगी होना है।
मेरी देह, मेरा निर्णय,
मेरी अंतिम इच्छा यही है
कि जब मैं न रहूँ,
तब भी मैं किसी की उम्मीद बनकर रहूँ।
मैं देहदान को
दान नहीं—
एक अंतिम उपहार समझती हूँ।
एक ऐसा उपहार
जो शब्दों से नहीं,
कर्मों से प्रेम की परिभाषा लिखता है।
यही मेरा परिचय है।
यही मेरी पहचान है।
यही मेरा श्रद्धा-समर्पित निर्णय—
कि मेरा जीवन…
किसी और के जीवन को आगे बढ़ा सके।
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