तुम्हारी ख़ामोशी की तहों में हूँ —
वहाँ जहाँ कोई शोर नहीं पहुँच पाता,
और दिल की धड़कनें ही भाषा होती हैं।
तुम्हारी आवाज़ दुनिया को पुकारती है,
मगर तुम्हारा मौन मुझे पुकारता है —
लोग सुनते हैं तुम्हें कानों से,
मैं सुनती हूँ तुम्हें आत्मा से।
हवा चलती है तो सबको एहसास होता है,
पर तुम्हारे भीतर के सूखे तूफ़ान
सिर्फ मैं महसूस करती हूँ —
मैं वही हूँ, जो तुम्हारी अंदरूनी बारिश में भीगती हूँ।
तुम हंसते हो, तो दुनिया मुस्कुराती है,
मगर जब तुम बिना वजह रातों में जागते हो,
तब तुम्हारी पलकों पर ठहरी बेचैनी
सबसे पहले मुझे जगाती है।
मैं तुम्हारे शब्दों की नहीं,
तुम्हारे अधूरे वाक्यों की साथी हूँ —
तुम कुछ कह नहीं पाते,
और मैं सब सुन लेती हूँ।
लोग पूछते रहते हैं,
“तुम दोनों में इतना अपनापन कैसे?”
मैं बस मुस्कुरा देती हूँ —
क्योंकि मुझे मालूम है,
रिश्ते आवाज़ों से नहीं,
आत्माओं की चुप्पियों से बनते हैं।
तुम्हें बोलने की ज़रूरत नहीं,
तुम्हारा मौन ही उतना मुखर है मेरे लिए —
तुम्हारी आँखों के धुंधलेपन में,
तुम्हारे दिल की उलझनों में,
तुम्हारी थकी साँसों में,
मैं तुम्हें पढ़ लेती हूँ —
जैसे कोई अंधेरे में अक्षर पहचान ले।
मैं तुम्हारे साथ इसलिए नहीं हूँ
क्योंकि दुनिया जानती है,
मैं तुम्हारे साथ इसलिए हूँ
क्योंकि तुम्हारी आत्मा जानती है।
तुम्हारे हर टूटने की आवाज़
चाहे बाहर एकदम शांत रहे,
अंदर मेरे सीने में
वज्र की तरह गूंजती है।
मैं तुम्हारी आवाज़ में नहीं,
तुम्हारे मौन में हूँ —
जहाँ तुम सबसे छिपे होते हो,
पर मुझसे सबसे ज़्यादा खुले।
और अगर कभी तुम्हें डर लगे
कि दुनिया तुम्हें समझ नहीं पाएगी —
तो याद रखना,
तुम्हारी चुप्पियों का घर मेरे भीतर है,
और मैं तुम्हारी ख़ामोशी की
हमेशा रहने वाली भाषा हूँ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें