समाज में विवाह को एक पवित्र संस्कार, जीवन की पूर्णता और सामाजिक स्वीकृति का माध्यम माना जाता है। माता-पिता भी प्रायः अपनी पुत्री के विवाह को अपना सबसे बड़ा दायित्व समझते हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि यदि विवाह इतना ही पवित्र और सुखद संस्थान है, तो फिर इतनी सारी महिलाएँ विवाह के बाद हिंसा, दहेज उत्पीड़न, मानसिक प्रताड़ना, असमानता और अपने सपनों के दमन का सामना क्यों करती हैं?
वास्तव में समस्या विवाह में नहीं, बल्कि उस सोच में है जो विवाह को स्त्री का अंतिम लक्ष्य मान लेती है। अनेक परिवारों में बेटी की शिक्षा, उसकी महत्वाकांक्षाएँ, उसकी इच्छाएँ और उसका आत्मनिर्णय का अधिकार, विवाह के सामने गौण हो जाते हैं। समाज के भय, रिश्तेदारों की बातों और तथाकथित "संस्कारों" के दबाव में माता-पिता कभी-कभी बेटियों को ऐसे संबंधों में धकेल देते हैं जिनके लिए वे मानसिक रूप से तैयार नहीं होतीं।
विडंबना यह है कि जिस विवाह को दो व्यक्तियों के प्रेम, सम्मान और साझेदारी का संबंध कहा जाता है, वहीं कई बार वही संबंध स्त्री के लिए बंधन, समझौता और त्याग का पर्याय बन जाता है। यदि विवाह केवल सामाजिक प्रतिष्ठा बचाने का माध्यम बन जाए, तो वह संस्कार नहीं, एक बोझ बन जाता है।
माता-पिता का उद्देश्य अपनी पुत्री का अहित करना नहीं होता। अधिकांश माता-पिता अपनी समझ के अनुसार उसका भविष्य सुरक्षित करना चाहते हैं। लेकिन बदलते समय में सुरक्षा का अर्थ केवल विवाह नहीं है। शिक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास और अपने जीवन के निर्णय लेने की स्वतंत्रता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि बेटियों को यह अधिकार मिले कि वे कब, किससे और क्या विवाह करना चाहती हैं, या करना भी चाहती हैं या नहीं। संस्कार का अर्थ आज्ञाकारिता नहीं, बल्कि विवेक, सम्मान और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता होना चाहिए।
किसी भी समाज की प्रगति इस बात से नहीं मापी जाती कि उसने स्त्री को कितनी ऊँची चौकी पर बैठाकर पूज्य कहा, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि उसने उसे अपने जीवन का निर्णय लेने की कितनी स्वतंत्रता दी। विवाह तब तक सुंदर है जब तक वह दो स्वतंत्र व्यक्तियों का स्वैच्छिक साथ है; जहाँ दबाव, भय और मजबूरी आ जाए, वहाँ संस्कार की आत्मा खो जाती है।
बेटियों को विवाह का उपहार नहीं, विकल्प दीजिए; क्योंकि जीवन उनका है, और उसका निर्णय भी उन्हीं का होना चाहिए।